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भारतीय स्वाधीनता के अमृत महोत्सव- विश्वगुरु श्रृंखला के क्रम में वैश्विक भारतवंशियों की भूमिका: प्रो. पुष्पिता अवस्थी

भारतीय संस्कृत में वैश्विक मानवीय संस्कृति की चेतना के गुणसूत्र हैं। भारतीय राष्ट्र की अस्मिता का बोध अंग्रेजों की पराधीनता का परिणाम नहीं है। वह शताब्दियों पूर्व से घटित और रचित है। इसका संबंध सिर्फ एक धर्म से नहीं रहा बल्कि धार्मिक सहनशीलता और उदारता के कारण भारत भूमि में प्राचीन काल से अनेक धर्म अनीश्वरवादी, चिंतन तक पल्लवित होते रहे। जो भारतीय संस्कृति चेतना के मूल शक्ति सिद्ध हुए।

भारतीय मनीषा और संस्कृत की समृद्ध चेतना ही देश को स्वाधीन कराने में समर्थ हो सकी। भारत देश की संपूर्ण जातियों का समान इतिहास, उनकी सांस्कृतिक समानताएं, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उनका परस्पर संबंध और सम्मिलित विकास ने एक तरह की समग्र राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया था। विश्व दास प्रथा के समाप्त हो जाने के उपरांत कृषक व्यवसाय जीवित रखने निमित्त विश्व के सत्ताधारी राष्ट्रों का ध्यान दक्षिण एशियाई देशों की ओर आकृष्ट हुआ। हिंदुस्तानी के मजदूरों निमित्त ब्रिटिश फ्रेंच और डच सत्ताधारी एजेंटों ने अपना मुख्य डिपो कलकत्ता में स्थापित किया।

भरती के लिए डच एजेंटों ने गोरखपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, बस्ती तथा मथुरा में भरती निमित्त अपने उपकेंद्र खोले। उन्हें एक आदमी के लिए ₹5 और स्त्रियों के लिए इससे भी अधिक कमीशन मिलता था। स्त्रियों की संख्या कम होने के कारण कहीं-कहीं एक स्त्री को कई पुरुषों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती थी। कोलोनाईजर मालिक अपने हिस्से में प्रशासनिक केंद्र और कार्यालयों से सुंदर स्त्रियां रख लेते थे। शेष बची हुई स्त्रियों का किसान मजदूर समाज में बंटवारा कर देते थे। इस तरह जोड़े बन जाते थे।
शकर, शर्करा चीनी में दाने डच भाशियों के लिए साउकर और सरनामी हिंदी में शुकरू है जो विश्व में गुलामी तथा शर्त बंदी प्रथा के अंतर्गत विश्व के ब्रिटिश फ्रांस तथा डच समराज्य से जुड़े देश द्वीपो के क्षेत्रों में मजदूरी करते रहे। दरअसल वे गन्ना नहीं अपितु कोलोनाइजिंग की मशीन में अपनी देह ही पेर रहे थे। जिन्हें कुली कुन्ता और कलकतिया की पहचान मिली।

भारत भूमि ‘पराधीन सपनेहु सुख नाही’ पीड़ा की साक्षी रही है। शताब्दियों और पीढ़ियों से पराधीनता के दंश को जीने और भोगने को अभिषप्त रहने वाली हिंदुस्तानी जनता एक और स्वाधीनता निमित्त स्वदेश में प्रण पण से संघर्षरत थी। तो दूसरी ओर विश्व के दूर देशों में ले जाए गए किसान मजदूरों के अपने जीवन और जीविका के स्तर पर संघर्ष रहते हुए स्वाधीनता का युद्ध छेड़े हुए थे। जहां उन्हें बदतर हालात में रखकर साम्राज्यवादी शक्तियां समृद्ध हो रही थीं। हिंदुस्तानी भारतवंशी अपने साथ लोग संस्कृत के मूल मंत्र, मूल सूत्र, रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, लोकगीत और कबीर के निर्गुण साथ ले गए थे। इतिहास की जड़ों में भारत से निर्वासित संघर्ष के वे अग्रदूत हैं जो उड़ीसा, बंगाल, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ,़ बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आकर कैरेबियाई देशों तथा सूरीनाम गयाना, ट्रिनीडाड,मॉरीषस, फीजी, दक्षिण अफ्रीका में अपनी अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पहुंचे और उसी से अपनी स्वाधीनता और स्वामित्व की लड़ाई लड़ी। साथ ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया। देश के नागरिक जब उन अकाल, बाढ़ और ब्रिटिश नागरिकों के खून खराबे से त्रस्त हो जाते थे तो भारतवंषी बाहुल देशों के किसान मजदूर अपनी उपज और अन्य सहायताएं अपने देश भारत पहुंचाते थे। भारत की स्वाधीनता के लिए हिंदुस्तान की आजादी के गीत गाते हुए वह परदेष में खेतों में मजदूरी करते थे।

भारत देश के हिंदुस्तानी हिमालय की धरती छोड़कर अत्याचारी जमीदारों और सत्ताधारियों की नागपाषी पराधीनता से मुक्ति निमित्त अपनी गठरी और ठठरी सहित, अंडा, बच्चा सकेले हुए जल जहाजों से लोकगीतों के स्वप्न देखते हुए पराधीन देश द्वीपों की ओर निकल पड़े थे। अपने लिए नई मातृभूमि घर वाली की इज्जत के खातिर बेइज्जत होते रहे। स्त्रियों अपने झिर झिरे आंचल तले ढकती रही थी बहु बेटियां। स्वदेष और स्वाधीनता के लिए सतुआ की तरह पिसते रहे गोरों की कमाई के लिए। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किसान मजदूरों को झोका गया सैनिकों की तरह। फांवड़े और कुदाल चलाने वाले किसानों ने उनके राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राणों की परवाह किए बिना बंदूके संभालीं कि ब्रिटिश साम्राज्य उनकी इन सेवाओं से भारत देश को आजाद कर देगा। स्वदेश से लेकर विदेश तक में ब्रिटिश, डच और फें्रच कोोनाइजरों ने विश्वासघात किया। हिंद महासागर अपने अन्य मित्रों के साथ सुनता रहा है शताब्दियों से पराधीन हिंदुस्तानियों की चीख पुकार। स्वाधीनता हासिल करने के निमित्त चढ़ाते रहे हैं सूर्य को अपने पसीने का अर्घ्य जिसका परिणाम है स्वाधीनता का अमृत महोत्सव।

हिंदुस्तान में ब्रिटिश साम्राज्य की पराधीनता के दौरान एक बार किसान मजदूर अपनी मातृभूमि में रौंदे गए। वहां से उन्हें विस्थापित करते हुए मजदूर मशीन के रूप में एग्रीमेंट और कांट्रैक्ट के तहत दूसरे देशों में फेंके गए। काले पानी से भी बदतर सजा के गुलाम बनाए गए। हिंदुस्तान की धरती से विस्थापित किसान मजदूरों ने दोहरे स्तर पर पराधीनता की पीड़ा सही। स्वदेश के वियोग और परदेश की दास्तां की यातना से संतृस्त किसान मजदूरों की चेतना हमेशा बिलखती ही रही।

ब्रिटिश सत्ताधारियों ने सिर्फ हिंदुस्तान में हिंदू और मुसलमानों के बीच बांटो और शासन करो की नीति नहीं चलाई अपितु भारत भूमि के जो हिम्मती और कद्दावर किसान मजदूरों का समाज था उन्हें प्रलोभित करके फ्रेंच और डच कॉलोनाइजर के हाथों बेच कर भारत देश के स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या कम कर दी। ‘‘किंग्सले डेविस के अनुसार-30 मिलियन भारतवासी विदेश ले जाए गए जबकि 1900ई. में भारत की आबादी 300 मिलियन मानी गई है। तात्पर्य है 10 प्रतिषत भारतीयों को विदेश ले जाया गया। ( भारतवंशी की भाषा एवं संस्कृति, किताबघर प्रकाशन दूसरे देश द्वीपू के हिस्सों में हिंदुस्तानियों को बैलों की जोड़़ी से भी बदतर हालात में रखकर जोते रखा गया) अपनी सत्ता और पूंजी का हल उनके नाजुक कंधों पर रखा गया। स्वदेश में पराधीनता की यातना का स्वाद वे पहले ही चख चुके थे। पुनः परदेश में गुलामी की यंत्रणा से गुजरने का दुख उनके लिए गहरे अर्थों में स्वाधीनता के अर्थ को समझने का सबूत बना। वे स्वाधीनता और मातृभूमि के महत्व को अपने जीवन का सर्वाेच्च सुख समझने लगे थे। विदेश में कोलोनाइजरों की दासता के भीतर जीते हुए उन्हें भारत भूमि की स्वाधीनता के संघर्ष की चिंता विचलित किए रहती थी। कोलोनाइजरों के द्वारा फिजी, मॉरीषस, सूरीनाम गयाना जैसे देशों में कुली कॉलोनी बनाई गई, वहां की धरती आज भी उनके लाल पसीने के संघर्ष की साक्षी बनी हुई है।

षर्तबंदी प्रथा के तहत विश्व के द्वीपों में निर्दयता से ले जाए गए हिंदुस्तानी मजदूरों को पराधीनता की दोहरी पीड़ा झेलनी पड़ी थी। अपनी मातृभूमि ,समाज, संस्कृत से उजाड़ कर उन्हें जिस पराई विदेशी संस्कृत में सांस लेना पड़ रहा था वह उनके लिए मृत्युदंड से बदतर था। दूसरे उन्हें अपने जीवन जीविका के अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर गोरों की पराधीनता तले जीवन गुजारना पड़ रहा था। इसी पर विस्तार से बनारसीदास चतुर्वेदी ने 1918 में 728 प्रश्नों में प्रवासी भारतीय पुस्तक लिखी थी। श्री तोताराम सनाढ्य जिन्होंने फीजी का परिचय भारत को दिया। श्री तोताराम सनाढ्य की लिखी हुई फीजी द्वीप मंें मेरे 21 वर्ष 4 भाषाओं में अनुदित हुई और उस समय के प्रमुख पत्रों ‘हिंदू और लीडर’ ने संपादकीय अग्रलेखों में उसका उल्लेख किया। उस समय उत्तर प्रदेश के गवर्नर सर जॉन मैस्टन ब्रिटिश भारत के मंत्री को सूचित किया कि फिजी द्वीप 21 वर्ष नामक पुस्तक उत्तर प्रदेश के गांव गांव में पहुंच गई है। अब वहां से फीजी जाने के लिए कोई तैयार नहीं है। इसका उल्लेख समाज सम्मेलन लंदन में भी किया गया। प्रवासी किसानों के संघर्ष को लेकर ‘मर्यादा’ पत्रिका ने अपने विशेषांक केंद्रित किए।

प्रोफेसर ह्यूग हिनकर ने अपनी पुस्तक ‘ए न्यू सिस्टम आफ स्लेवरी’ में शकर कोठियों की असलियत लिखी। जिसकी सत्यता को बयान करता हुआ फीजी लोक गीत की पंक्तियां हैं-

सब दुख खान सी एसआर की कोठरिया
छह फुट चौड़ी, 8 फुट लंबी
उसी में धरी है कमाने की कुदरिया
उसी में सिल और उसी में चूल्हा
उसी में धरी है जलाने की लकरिया
सब दुख खान सी.एच.आर की कोठरिया
यहीं में खाना यहीं में सोना
यही में बहत पनरिया, यही में बहत पनरिया
‘तास’ बड़ा सरदखा देवे, सर पर हनत कुदरिया
मूड़ पड़त है-देह दुखत है, टूटी जात कमरिया
तास, शब्द अंग्रेजी के टास्क शब्द का हिंदीकरण है जिसे हिंदुस्तानी मजदूरों ने अंग्रेजों के एग्रीमेंट को गिरमिटिया और डच के कॉन्ट्रैक्ट को कन्न्नाकी केे रूप में अपने प्रयोग में रख लिया था।
भारतवंषी भाषा एवं संस्कृति, किताब घर पृष्ठ 20, 2015

लतिन अमेरिका के उत्तरी शीर्ष पर स्थित सूरीनाम, डच गमाना देश में हिंदुस्तानियों द्वारा हृदय विदारक लोकगीत गाए जाने का चलन है।

थोड़ा अइली हिंदुस्तानवा बबुआ पेटवा के खातिर
छोड़ली मय्या, बप्पा, बंधुसारा परिवरना
घूटल मिलन के आस
पड़ली भरम में छूटल पटना के षहरवा
छुट गइले प्यारी गंगा मैया के अचरवा
नहीं मनली एकौ बाबा भैया के कहनवा
बाबू पेटवा के खातिर
छोड़ अइली हिंदुस्तानवा बबुआ पेटवा के खातिर

स्वदेश की पराधीनता और निज जीवन की पराधीनता परदेश के निर्वासन की यातना का साहित्य अनवरत चार पीढ़ी द्वारा गीतों कविताओं और किस्सों में हिंदी भाषा परिवार की बोलियों में रचा जा रहा है। भारतवंशी बहुल देशों के संघर्ष के दस्तान का साहित्य तैयार है। जिसे भारतीय हिंदी भाषाविदों, साहित्यकारों द्वारा पं. बनारसी द्वारा चतुर्वेदी और तोताराम सनाढ्य के हृदय की आंखों से जांचने, परखने, समझने और जानने की आवश्यकता है। तुलसीदास की पंक्ति लेकर कहे तो-

से परम दुख पावहीं, सिर धुनि धुनि पछिताई,
कलहिं कर्महिं ईष्वरहिं, मिथ्या दोश लगाइ।।

जिस भाति अशोक वाटिका में माता जानकी अपनी रक्षा कर रही थीं। कुछ इसी तरह हिंदुस्तानी किसान मजदूर अपनी रक्षा कर रहे थे।

कहहु तात केहि भाति जानकी, रहति करति रक्षा स्वप्रान की
स्वदेष के स्वाधीनता के संघर्शषील कर्मठ नागरिकों के समान्तर ही विदेषों में बसे हिंदुस्तानियों बनाम भारतवंषियों के संघर्ष की करुण दास्तान ह,ै जिसकी सिसकियां अभी भी उनकी पीढ़ियो में सुनाई देती है।

डॉ. पुश्पिता अवस्थी- कवि लेखक, यायावर, चिंतक,
अध्यक्ष, हिंदी यूनिवर्स फाउन्डेषन, नीदनरलैंड
अध्यक्ष- आचार्यकुल, गार्जियन ऑफ अर्थ एन्ड ग्लोबल कल्चर, ग्लोबर अम्बेसडर

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