
आदमी जब तक अपनी चिंता में रहता है कि मुझे यह करना है, मुझे वह करना है में ही लगा रहता है । वह शांति प्राप्त नहीं कर सकता । यह वह की चिन्ता में ही डूबा रहता है । शांति प्राप्त करने का मुख्य तरीक़ा अपने आप को खो देना है और अपने आपको खो देने के कई तरीके हैं । जैसे ध्यान में खो जाना, आध्यात्मलीन हो जाना आदि-आदि । हम अक्सर सोचते हैं कि आध्यात्मिक जीवन माने पहाड़ों पर जाकर ध्यान, तप, शास्त्रों का पठन आदि करना, सांसारिक जीवन से विमुख होकर रहना आदि आदि।हमारी यह धारणा सही नहीं। वास्तव में योग केवल उपरोक्त ही नहीं हैं । योग हर कर्म में स्थिरता लाना है यानि हर काम को एकाग्रता से करना हैं । ऐसो पंच णमोक्कारो का स्मरण हमको आत्मा में रमण करने को अग्रसर करता है ।वह हमको वास्तविक आनन्द में रमण करवाता हैं ।
हमने यौगलिक युग से निकल कर वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर लिया है , हमारे करने के लिए शेष व अवशेष ऐसे में अब कुछ भी नहीं बचा है । युग सदा परिवर्तनशील होता है । कषायों को कषायों से कौन जीत पाया हैं । क्षमा ऋजुता के सामने कषाय कब टिक पाते हैं । कषाय रूपी कीचड़ में जो कमल बन मुस्कराया हैं । उसने इस जीवन को सार्थक वह सफल बनाया हैं । हम जान कर भी कचरे से भरे रहते हैं । महावीर को मानते तो है पर हमारी राह उल्टी ओर है । जैन आगम वांगम्य में नमस्कार महामंत्र का स्थान अनादि से अत्यंत पवित्र और मंगलकारी माना गया हैं ।
हम प्राणीयों को पंचपरमेष्ठियों के प्रति श्रद्धा जागृत कर आत्म शुद्धि की दिशा में प्रेरित करने वाला यह मंत्र अनेक आगमों, टीकाओं और व्यख्याओं आदि में विविध रूपों में संदर्भित मिलता हैं । लेकिन इसका सर्वप्रथम प्रामाणिक रूप कहीं अंकित हुआ तथा इसका रचनाकार कौन माना जाए – इन प्रश्नों पर विद्वानों में मतभेद रहा हैं । अनेक- अनेक आचार्यों ने इसे आदि मंगल के रूप में स्वीकृत किया और सूत्रों के प्रारंभ में लिखने की परंपरा भी प्रचलित पाईं जाती हैं । अभयदेवसुरि, वीरसेनाचार्य, मलयगिरि, व्रजस्वामी आदि अनेक मनीषियों ने इसकी व्याख्या, उद्धार और टीका आदि की परंतु मूलस्रोत स्पष्ट नहीं हो पाया हैं । हम प्राप्त होने पर बहुत प्रसन्न हो जाते है और प्राप्त ना होने पर व कम प्राप्त होने पर नाराज हो जाते है । ख्वाईशों की दुनियां में सबका राज ऐसे ही चलता है। हम सदा ऐसे ही सोचें कि जो प्राप्त है पर्याप्त है, प्रसन्नता व खुशियों की सुगंध जीवन के हर कौने में व्याप्त है ।
महावीर स्वामी के काल से पूर्व ही नमस्कार की परंपरा विद्यमान होने के संकेत उपलब्ध हैं। खारवेल के पुरालेख में णमो अरहंताणं और णमो सव्व सिद्धांण जैसे पद मिलते हैं , जिनसे स्पष्ट होता हैं कि मंत्र का मूल तत्त्व अति प्राचीन हैं और आचार्य पुष्पदंत या अन्य उत्तरवर्ती आचार्यों से भी पहले प्रयोग में था । नंदी और आवश्यक के प्रकरणों में समायिक के प्रारंभ और अंत में पंचपरमेष्ठी को नमस्कार करने का निर्देश मिलता हैं । इससे यह मान्यता प्रबल होती हैं कि नमस्कार महामंत्र मूलतः सामायिक अध्ययन का अंग रहा होगा । सिद्ध- अर्हतादि की वंदना के माध्यम से साधक आत्मसंयम के लिए प्रवृत्त होता हैं । यही कारण है कि कईं आगमों के प्रारंभ में नमस्कार लिखने की परंपरा बनी और इसे सर्वश्रुताभ्यंतरवर्ती माना गया ।
मूलस्रोत के विवाद के साथ – साथ मंत्र के पदक्रम की चर्चा भी प्राचीन ग्रंथों व अन्य ग्रंथों में मिलती हैं । सिद्ध- अर्हत- आचार्य- उपासक- साधु के क्रम को पूर्वानुपूर्वी माना गया हैं, क्योंकि सिद्ध, अर्हत के उपदेश द्वारा जाने जाते हैं और ज्ञापक रूप में अधिक निकट तथा पूज्य आदि माने गए । स्पष्ट हैं कि नमस्कार महामंत्र केवल वंदना का सूत्र नहीं , बल्कि यह दर्शन साधना और श्रुत-परंपरा की एक गहन ऐतिहासिक निरंतरता का द्योतक हैं- जिसकी मूल रूप से जड़े सामायिक और पंचपरमेष्ठी वंदना में निहित प्रतीत होती हैं ।
अतः हम कब तक मकड़ी के जालों की तरह उलझते रहेंगे । वह संसार समुद्रे में भटकतें रहेंगे । हम स्वयं को कभी एकांत में जाने । हम परमात्म को पहचाने कि मैं कभी शांत स्वरूप आत्मा हूं । हमारा स्वधर्म शान्ति ही हमारा पवित्रता का आभूषण है।
प्रदीप छाजेड़ (बोरावड़ )
पता – प्रदीप छाजेड,छाजेड़ सदन, गणेश डूँगरी गेट के पास, सबलपुर रोड़, जिला – डीडवाना- कुचामन, राज्य – राजस्थान, पोस्ट – बोरावड़, पिन -341502
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