मिट्टी की खुशबू से आत्मनिर्भरता की उड़ान

माटी कला महोत्सव-2026: परंपरा को तकनीक, हुनर को बाजार और कारीगरों को रोजगार से जोड़ने की पहल
18,432 विद्युत चाकों ने बदली काम की रफ्तार, 48 हजार से अधिक कारीगर परिवारों तक पहुंची पहचान
पिछले साल पांच करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री, इस बार नया कीर्तिमान बनाने की उम्मीद
लखनऊ। मिट्टी को आकार देकर जीवन की जरूरतें पूरी करना हो या दीपों से घर-आंगन रोशन करना, कुम्हार का हुनर भारतीय संस्कृति की पहचान रहा है। उसके हाथों में मिट्टी सिर्फ एक कच्चा माल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला, आजीविका और परंपरा की विरासत है। बदलते दौर में जब बाजार की मांग और उत्पादन की तकनीक तेजी से बदल रही है, तब इसी पारंपरिक हुनर को आधुनिक सुविधाओं के साथ नई उड़ान देने की कोशिश हो रही है। लखनऊ के खादी भवन में शुरू हुआ माटी कला महोत्सव-2026 इसी बदलाव की कहानी कहता है, जहां मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता की संभावनाएं भी आकार ले रही हैं।
बुधवार को हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग, खादी एवं ग्रामोद्योग मंत्री राकेश सचान ने फीता काटकर महोत्सव का उद्घाटन किया। आयोजन का उद्देश्य मिट्टी से जुड़े पारंपरिक उत्पादों को नया बाजार उपलब्ध कराने के साथ कारीगरों को आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता से जोड़ना है। महोत्सव में जहां कारीगर अपने हुनर और उत्पादों को प्रदर्शित कर रहे हैं, वहीं सरकारी योजनाओं के जरिए उनके काम को अधिक सुविधाजनक और लाभकारी बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

हाथों का हुनर, मशीनों का साथ
कल्पना कीजिए उस कुम्हार की, जो घंटों मेहनत करके मिट्टी को गूंथता है, चाक पर बर्तन बनाता है और फिर उन्हें बाजार तक पहुंचाने की तैयारी करता है। पारंपरिक तरीके से यह काम श्रमसाध्य होने के साथ समय भी अधिक लेता है। ऐसे में विद्युत चालित चाक और मिट्टी गूंथने वाली मशीनें उसके लिए केवल उपकरण नहीं, बल्कि काम की रफ्तार बढ़ाने का साधन बन सकती हैं।
उत्तर प्रदेश में अब तक 18,432 विद्युत चालित चाक वितरित किए जा चुके हैं। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में 2,740 और विद्युत चाक देने का लक्ष्य है। मिट्टी गूंथने की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए 675 पगमिल मशीनें वितरित की गई हैं, जबकि इस वर्ष 300 अतिरिक्त मशीनें देने की योजना है।
मूर्तिकला को प्रोत्साहित करने के लिए 603 जोड़ी पीओपी सांचे, 31 पेंटिंग मशीनें और 81 दीपक बनाने वाली मशीनें भी उपलब्ध कराई गई हैं। इन सुविधाओं का उद्देश्य कारीगरों को पारंपरिक कला से दूर करना नहीं, बल्कि उनके हुनर को आधुनिक उत्पादन व्यवस्था के साथ जोड़ना है, ताकि वे बाजार की जरूरतों के अनुरूप अपने उत्पाद तैयार कर सकें।
48 हजार से अधिक परिवारों की आजीविका से जुड़ी है माटी कला
माटी कला का महत्व केवल मिट्टी के बर्तन बनाने तक सीमित नहीं है। इसके साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारिवारिक रोजगार, स्थानीय बाजार और सांस्कृतिक विरासत का बड़ा संसार जुड़ा है। उत्तर प्रदेश माटी कला बोर्ड के गठन के बाद इस क्षेत्र को व्यवस्थित रूप से प्रोत्साहित करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
19 जुलाई, 2018 को गठित उत्तर प्रदेश माटी कला बोर्ड ने अब तक प्रदेश में 48,048 कारीगर परिवारों को चिह्नित किया है। कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 39,468 माटी कला कारीगरों को मिट्टी खनन के पट्टे भी आवंटित किए गए हैं।
मिट्टी उपलब्ध होने से लेकर उत्पाद तैयार करने और उसे बाजार में बेचने तक की प्रक्रिया में अनेक चुनौतियां आती हैं। ऐसे में कच्चे माल की उपलब्धता, आधुनिक उपकरण और बिक्री के अवसर एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इन सभी पहलुओं पर एक साथ काम होने से पारंपरिक कारीगरों के सामने मौजूद व्यावहारिक कठिनाइयों को कम करने में मदद मिल सकती है।
हुनर को कारोबार में बदलने की तैयारी
कला में दक्षता और कारोबार चलाने की समझ, दोनों किसी भी छोटे उद्यम की सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसी सोच के साथ मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के अंतर्गत कारीगरों को स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
पिछले सात वर्षों में योजना के तहत 1,333 लाभार्थियों के लिए ऋण स्वीकृत किए गए, जिससे वे अपनी माटी कला इकाइयां स्थापित कर सकें। वित्तीय वर्ष 2026-27 में मार्च 2027 तक 300 अतिरिक्त इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
प्रशिक्षण के मोर्चे पर भी काम किया गया है। पिछले सात वर्षों में 18,432 लाभार्थियों को आधुनिक उपकरणों के संचालन का तकनीकी प्रशिक्षण, 1,333 को उद्यम प्रबंधन और 7,836 को शिल्पकला का प्रशिक्षण दिया गया है। प्रदेश के पीलीभीत, रामपुर, कन्नौज, अमरोहा, बाराबंकी, फिरोजाबाद, बिजनौर, अमेठी, बरेली और जालौन में कॉमन फैसिलिटी सेंटर स्थापित किए गए हैं।
इन पहलों का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि किसी कारीगर के लिए केवल उत्पाद बना लेना पर्याप्त नहीं होता। उसे उत्पादन की लागत, गुणवत्ता, बाजार की पसंद और बिक्री के तरीकों की जानकारी भी चाहिए। हुनर के साथ कारोबारी समझ जुड़ने पर पारंपरिक कला को स्थायी आजीविका में बदलने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
पांच करोड़ की बिक्री से आगे बढ़ने की उम्मीद
किसी भी हस्तशिल्प महोत्सव की सफलता का आकलन केवल वहां प्रदर्शित उत्पादों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होता है कि कारीगरों को कितने ग्राहक मिलते हैं और उनके उत्पादों की कितनी बिक्री होती है।
मंत्री राकेश सचान के अनुसार, पिछले वर्ष माटी कला महोत्सव में पांच करोड़ रुपये से अधिक के उत्पाद बिके थे। इस बार भी बिक्री का नया रिकॉर्ड बनने की उम्मीद जताई गई है। महोत्सव कारीगरों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने और ग्राहकों से सीधे जुड़ने का अवसर देता है।
कुल्हड़, घड़े, सुराही, दीपक, खिलौने और सजावटी मूर्तियां आज भी मिट्टी की पारंपरिक कला की पहचान हैं। इन उत्पादों को आधुनिक डिजाइन और ग्राहकों की बदलती पसंद के अनुरूप तैयार किया जाए, तो इनके लिए नए बाजार विकसित करने की संभावनाएं बन सकती हैं। साथ ही मिट्टी के उत्पादों को प्रोत्साहन देना स्थानीय कारीगरों के काम को पहचान दिलाने और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा देने की दिशा में भी उपयोगी हो सकता है।
सहायता के साथ सम्मान भी
महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर पांच कारीगरों को निःशुल्क विद्युत चालित चाक और दो कारीगरों को पगमिल मशीनें प्रदान की गईं। लखनऊ के शिवा प्रजापति, रामखेलावन, नन्हा, अजय और गायत्री को विद्युत चाक का लाभ दिया गया। वहीं, रमेश कुमार और दिलीप कुमार को पगमिल मशीनें प्रदान की गईं।
मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के अंतर्गत लखनऊ के डालीगंज स्थित मुंशीगंज की निवासी श्रेया को दो लाख रुपये के बैंक ऋण का चेक दिया गया। कार्यक्रम में इन लाभार्थियों को सम्मानित भी किया गया।
इस तरह महोत्सव में उपकरणों की उपलब्धता, वित्तीय सहायता और कारीगरों के सम्मान को एक साथ स्थान दिया गया। इसका संदेश है कि पारंपरिक शिल्प को आगे बढ़ाने के लिए कारीगरों को केवल अपनी कला पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंचने के अवसर भी मिलने चाहिए।




