दुनिया में अभयदान हैं श्रेष्ठदान


दान तो ऐसा हो की इस हाथ दे तो इस हाथ पता ना चले। वह दान तो हर एक से एक श्रेष्ठ हैं। चाहे वह अभय-स्नेह-वक़्त-सुपात्र दान हो। एक प्रसंग दान का-राजा शंख अपनी महारानी के साथ बाग़ में टहल रहे थे । मध्याह्न का समय एक मुनि श्री उधर से आ रहे थे । वह पसीने से लथपथ कंठ भी सुख गले को अवरुद्ध कर रहा था। मुनि की मौन आकृति को रानी समझ गयी । वह उसने बाग़ में प्रासुक धोवन पानी का मुनि श्री को निवेदन किया राजा भी वंचित ना रहा और बलवती भावना से दोनों ने प्रासुक जल बहराया। मूल्य वस्तु का नही भावना हैं।
वह इसका अध्यवसाय एवं परिणाम तुच्छ दान देकर है । तीर्थंकर नाम कर्म का उपार्जन हो सकता है। इस प्रकार बिना अभिमान के सुपात्र दान श्रेयस्कर है। आत्म संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा आनन्द है, आत्मतोष की अनुभूति ही तो सच्चा आनन्द है। इसके सामने दूसरे सभी आनन्दों की सीमाएं मंद है । पर वह उसे ही मिलाती है, जिसके कषाय मंद है।करूणा,दया,श्रद्धा,विश्वास कई मार्ग है उसे पाने के अपने मे अवस्थित हो जाना ही तो, परमानन्द है। भय एक संज्ञा हैं, वृत्ति हैं । मोहनीय कर्म का ही अंग भय संज्ञा हैं । भय की संज्ञा दुर्बलता पैदा करने वाली होती हैं ।
आठ आत्माओं में एक मात्र कषाय आत्मा ऐसी हैं जो एकांत सावद्य हैं । एकांत अशुभ हैं जिनमें 16 प्रकृतीयां – अनंतानुबंधी , अप्रत्याख्यानी, प्रत्याख्यानी, संज्जवलन चतुष्क ( क्रोध, मान,माया, लोभ) की नौ कषाय और तीन दर्शन मोहनीय की होती हैं । मोहनीय कर्म के मूलतः दो विभाग हैं- दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय हैं । दर्शन मोहनीय के तीन प्रकार हैं- मिथ्यात्व और सम्वकत्व और मिश्र दर्शन मोहनीय होते हैं । शेष 25 भेद चारित्र मोहनीय के होते हैं । हमारा सम्वकत्व दर्शन मोहनीय से संबद्ध हैं । दर्शन मोहनीय का क्षयोपशम , क्षय या उपशम हैं तो सम्यकत्व की प्राप्ति होती हैं । भय चारित्र मोहनीय के परिवार के अंतर्गत हैं । यह भय संज्ञा आदमी और अन्य प्राणियों में कईं बार उभरती हैं और आदमी डरने लग जाता हैं । जैन वांगम्य में कहा गया हैं कि उन जिनों का तीर्थंकरों को नमस्कार हैं, जिन्होंने भय को जीत लिया हैं । सिद्ध भगवान् के तो भय की कोई बात ही नहीं हैं । तीर्थंकर और केवली भगवान् भी पूर्णतया अभय होते हैं ।
मानव की मानसिकता सभी मानव में एक समान नहीं होती है । पर जिसके दिल में धर्म- ध्यान हो वहीं मानव महान होता हैं । समय बड़ा बलवान होता है यदि विपत्ति में प्रभु-भजन करतें हैं , वह सुख परीक्षा का क्षण है क्योंकि सुख में परमात्मा में मग्न कौन रहता हैं ? भयभीत मानव की पहचान धर्म में प्रस्थान नहीं होने से होती हैं । अभयदान वरदान है जिसका सबकों भान नहीं होता हैं । जैसा बीज बोया, वैसा ही फल पाया ये मानसिकता मानव का व्यवहार दर्शाता और बतलाता हैं । ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थान वर्ती छद्मस्थ चरित्रात्माओं भी ऊपरी तौर पर भय से मुक्त होते हैं । ग्यारहवें गुणस्थान में भय उपशांत रूप में होता हैं, उदय रूप में नहीं होता हैं । 10 वें, 9 वें , 8 वें , 7 वें गुणस्थान में भी योग रूप से भय नहीं होता हैं ।
योग रूप में भय पहले से छठे गुणस्थान तक ही होता हैं । अतः छठे गुणस्थान तक प्राणी जिनमें मनुष्य और साधु सम्मिलित हैं उनमें भय की संज्ञा को प्राप्त कर सकतें हैं । अतः यदि यह संभव न हों सकें तो कीसी को डराना नहीं चाहिए । किसी में भय पैदा नहीं करना चाहिए । अभय के दो अर्थ हो सकतें हैं- डरना नहीं और डराना नहीं । दोनों संदर्भों में भय को हम देख सकतें हैं । हमारा जीवन अनित्य हैं । अतः इस अनित्य जीवन लोक में हिंसा में हमको आसक्त नहीं होना चाहिए । दूसरे प्राणियों को अभयदान का प्रयास करना चाहिए । दुनिया में अनेकदान हैं उनमें श्रेष्ठदान अभयदान देने को कहा गया हैं । छ : काय के जीवों की हिंसा करने का त्याग कर देना उन जीवों के प्रति अभयदान हो जाता हैं । अतः मोहनीय कर्म के उदय से आदमी को भय लगने लगता हैं । ऐसी स्थिति में जप, ध्यान आदि का आलंबन लेना चाहिए । किसी नाम का स्मरण करके भी हम भय के स्थान पर अभय को स्थापित करने का प्रयास कर सकतें हैं ।
हम अपनी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ – साथ यथासम्भव जरूरतमंद को भी सहायता करने का भाव रखे और सेवा -सुश्रूषा,विद्या और ज्ञानदान के साथ -साथ संयति दान और अभयदान का भाव रखते हुए परम आनंद की अनुभूति और सन्तुष्टि पाएं। कर्म चाहे क्षत्रिय कुल में जन्म ले या कोई भी कुल में अपने अपने होते हैं,उन्हें भोगे बिना किसी भी जीव को छुटकारा नहीं मिल सकता,हम जागरूक रहे हर पल,क्या पता किस समय हमारा आयुष्य बंध हो और हमारे परिणाम कैसे हो , हम निम्न गति का आयुष्य न बांध लें,अच्छा तो यह है कि हमारा प्रयास इतनी जागरुकता पूर्ण हो कि हमारे आयुष्य बंध हो ही ना, यहीं हमारा अंतिम भव हो।
कोई अच्छेरा हमारे को भी भव भ्रमण से बचाले,ऐसे ही हमारे निर्मल चैतसिक भाव हों । हम भगवान् महावीर से कुछ ओर न मांगे,उन जैसी सहनशीलता, और अभयदान के भाव हमारे नस नस में समा जाएं, जिससे हमारा भी आत्मोद्धार हो जाये। हम भी महावीर बन जाएं।
प्रदीप छाजेड़ (बोरावड़ )
पता – प्रदीप छाजेड,छाजेड़ सदन, गणेश डूँगरी गेट के पास, सबलपुर रोड़, जिला – डीडवाना- कुचामन, राज्य – राजस्थान, पोस्ट – बोरावड़, पिन -341502
नम्बर -9993876631




