उत्तर प्रदेशलखनऊसमग्र समाचार

सूचना विभाग का अघोषित द्वारपाल ‘सुपर सीएफओ’

डॉ सुयश नारायण
Dr. Suyash Narayan Mishra

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (सूचना) संजय प्रसाद हैं। वे जब भी अपने कार्यालय से बाहर निकलते हैं चाहे लिफ्ट में हों, गलियारे से गुजर रहे हों या वाहन में बैठने जा रहे हों पत्रकार, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक उनसे सहजता से मिल लेते हैं। चलते-चलते भी वे लोगों की बातें सुनते हैं, ज्ञापन और प्रार्थना-पत्र भी स्वीकार करते हैं। कई बार यदि मामला तत्काल समाधान योग्य हो, तो संबंधित अधिकारी को वहीं फोन कर आवश्यक निर्देश भी दे देते हैं। शायद ही कभी ऐसा देखने को मिलता हो कि उनके कार्यालय का कोई कर्मचारी किसी व्यक्ति को उनसे मिलने से रोके या अनावश्यक अड़चन पैदा करे। उनकी कार्यशैली का मूल आधार संवाद और सहज उपलब्धता है। सूचना निदेशक विशाल सिंह भी स्वभाव से सरल, मिलनसार और संवादप्रिय अधिकारी माने जाते हैं। उनसे मिलने वाले अधिकांश लोगों का अनुभव भी यही रहा है कि वे सहजता से बातचीत करते हैं। लेकिन विडंबना तब पैदा होती है, जब उनके आसपास कुछ लोग ऐसा वातावरण बना देते हैं मानो निदेशक से मिलना कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विशेष अनुमति का विषय हो। इससे न केवल पत्रकारों, बल्कि विभाग से जुड़े लोगों के बीच भी अनावश्यक दूरी का एहसास होने लगता है। जबकि सूचना विभाग का मूल उद्देश्य क्या है? संवाद को सहज बनाना या संवाद के रास्ते में औपचारिकताओं की दीवारें खड़ी करना? सूचना विभाग का काम सूचनाओं का प्रवाह बढ़ाना है, रास्ते बंद करना नहीं। क्योंकि जिस दिन पत्रकारों को सूचना निदेशक से मिलने के लिए भी ‘परिक्रमा पथ’ तय करना पड़ेगा, द्वारपालों की परिक्रमा करनी पड़ेगी,  उस दिन सूचना विभाग का नाम बदलकर शायद ‘अनुमति विभाग’ रखना अधिक उचित होगा।

जिस प्रदेश में राजभवन का नाम बदलकर जनभवन कर दिया गया हो, जहां श्रीराम मंदिर की स्थापना के साथ उत्तर प्रदेश की नई पहचान की मिसालें दी जा रही हों और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश की उपलब्धियों का देश-दुनिया में उल्लेख हो रहा हो, वहीं विडंबना यह है कि उसी सरकार के सूचना विभाग में संवाद का रास्ता कुछ लोगों की निजी चौखट से होकर गुजरता दिखाई देता है।

ये तस्वीर बुधवार की है। लोकभवन में गाड़ी पर बैठने से पहले एक माननीय का पत्र लेते अपर मुख्य सचिव सूचना संजय प्रसाद

सुपर सीएफओ का प्रभाव चर्चा का विषय

सूचना विभाग में कई सीएफओ आए और चले गए, लेकिन मौजूदा दौर में विभागीय गलियारों में सबसे अधिक चर्चा सुपर सीएफओ संजय सिंह की कार्यशैली को लेकर सुनाई देती है। चर्चा यह है कि उन्होंने ऐसा प्रभाव स्थापित कर लिया है कि कई बार लगता है मानो सूचना निदेशक के बाद वही विभाग के वास्तविक संचालक हों। जो विभाग निदेशक और पत्रकारों के संवाद के लिए ही बना हो। उसी विभाग के सीएफओ संजय सिंह अब पत्रकारों से कहते हैं। आओ तुम्हें बैठकर मिलवा देंगे। ऐसा सुपर सीएफओ सूचना विभाग में कभी नहीं आया। सूचना निदेशक के कार्यालय पहुंचते ही सुपर सीएफओ की सक्रियता देखते बनती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे उनका सबसे बड़ा दायित्व निदेशक की छाया बने रहना हो। नीचे तक छोड़ना, गाड़ी तक साथ जाना और दरवाजा बंद करने का ‘विशेषाधिकार’ भी मानो उन्हीं का एकाधिकार है। यदि इसी दौरान कोई पत्रकार निदेशक से मिलने का साहस कर ले, तो माहौल अचानक बदल जाता है। भौंहें तन जाती हैं, चेहरे के भाव सख्त हो जाते हैं और संदेश साफ और स्पष्ट हो जाता है कि ‘साहब से मिलने का भी एक निर्धारित क्रम है’ आप रास्ते में चलते गाड़ी में बैठते वक्त लिफ्ट में उनसे नहीं मिल सकते। यानी वहां सिर्फ सुपर सीएफओ संजय सिंह का ही अधिकार है।

बुधवार को सूचना निदेशक गाड़ी पर बैठने से पहले कई पत्रकारों से मिल रहे थे। उसी समय एक और पत्रकार ने उन्हे कुछ मैग्जीन भेट की। खुद सूचना निदेशक ने उस पत्रकार से सम्मानपूर्वक मैग्जीन ली और  प्रोत्साहित भी किया। संवाद भी किया लेकिन सुपर सीएफओ को इतना बुरा लग गया कि वह प्रोटोकाल का हवाला देकर रौब दिखाने लगे। मतलब साफ है अब सूचना निदेशक से मिलने के लिए पत्रकारों को द्वारपाल प्रक्रिया से गुजरना है। इतना ही नहीं सुपर सीएफओ भूल गये कि वह सिर्फ वित्त की देखरेख के​ लिए आए हैं विभाग को संचालित करने के लिए नहीं। सुपर सीएफओ का रूतबा देखिए उन्होंने यह तक कह डाला कि आप मेरे पास आइए मैं आपको डीआई से मिलवाता हूं। बैठकर मिलवाउंगा। यानी सूचना निदेशक सीएफओ के कहने पर बैठकर मिलते हैं। वह अलग बात है कि लोग चर्चा करते हैं कि जब भी सुपर सीएफओ के वहां जाओ बाहर अर्दली एक ही राग गाता है साहब सो रहे हैं। साहब जगते तभी हैं जब बड़े साहब आ जाते हैं।

निदेशक तक पहुंचने का अधिकृत रास्ता आखिर कौन-सा है?

अब पत्रकारों के बीच सवाल यह उठने लगा है कि सूचना निदेशक तक पहुंचने का अधिकृत रास्ता आखिर कौन-सा है? सरकारी वैयक्तिक सहायकों के माध्यम से, लोकभवन के पीआरओ के जरिए या फिर उस सुपर सीएफओ के माध्यम से, जिसके बिना बैठकर मुलाकात असंभव मानी जाने लगी है? यदि स्थिति यही रही तो सूचना विभाग में सूचना से अधिक महत्व ‘अनुमति’ का रह जाएगा और संवाद की जगह ‘परिक्रमा’ व्यवस्था ले लेगी। वक्त रहते यदि “चमचा व्यवस्था” पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो इसका असर केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित होगी। जब किसी कार्यालय में संवाद की जगह चाटुकारिता और योग्यता की जगह निकटता महत्व पाने लगे, तो संस्थागत कार्यप्रणाली कमजोर पड़ने लगती है। किसी भी व्यवस्था की मजबूती इस बात में है कि वहां पहुंच, संवाद और निर्णय पारदर्शी हों, न कि कुछ लोगों की कृपा पर निर्भर।

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