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वेंटिलेटर खरीद में बड़ा खेल

तकनीकी परीक्षण में पसंदीदा कंपनी बाहर हुई तो पूरी निविदा निरस्त करने की तैयारी के आरोप

लखनऊ। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के इलाज के लिए जीवनरक्षक वेंटिलेटरों की खरीद को लेकर उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीएमएससीएल) एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि 221 आईसीयू वेंटिलेटरों की खरीद के लिए जारी निविदा में तकनीकी परीक्षण के दौरान एक पसंदीदा कंपनी के मानकों पर खरा नहीं उतरने के बाद पूरी निविदा प्रक्रिया को ही निरस्त करने की कवायद की जा रही है। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि GEM/2025/B/5823357 के तहत 221 आईसीयू वेंटिलेटरों की खरीद प्रस्तावित है। यूपीएमएससीएल की वेबसाइट पर भी इस निविदा को आईसीयू वेंटिलेटर की खरीद के रूप में दर्ज किया गया है। उपलब्ध निविदा दस्तावेज के मुताबिक यह निविदा 15 जनवरी 2025 को जारी हुई थी और इसकी अनुमानित खरीद राशि करीब 39.78 करोड़ रुपये बताई गई थी।

खरीद प्रक्रिया पर सवाल?

बताया जा रहा है कि लंबे समय से लंबित वेंटिलेटर खरीद प्रक्रिया को तत्कालीन अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अमित घोष की पहल के बाद गति मिली। लेकिन अब यही प्रक्रिया तकनीकी परीक्षण और कंपनियों की पात्रता को लेकर विवादों में घिरती नजर आ रही है। शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आरोप है कि निविदा में शामिल कंपनियों के तकनीकी परीक्षण के दौरान विशेषज्ञ समिति ने कुछ कंपनियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया। आरोप यह भी है कि इनमें वह कंपनी भी शामिल थी, जिसे लेकर खरीद प्रक्रिया में विशेष रुचि दिखाई जा रही थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि किसी कंपनी का उपकरण तकनीकी परीक्षण में निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो क्या पूरी निविदा को रद्द करना ही एकमात्र रास्ता है?

11 कंपनियां मैदान में, तकनीकी परीक्षण पर उठे सवाल

इस निविदा में कुल 11 कंपनियों के भाग लेने की बात सामने आई है। 11 मई 2026 को तकनीकी मानकों के अनुरूप उपकरण के प्रदर्शन के लिए कंपनियों को आमंत्रित किया गया। शिकायत के मुताबिक परीक्षण में केजीएमयू, एसजीपीजीआई, लोकबंधु अस्पताल, सिविल अस्पताल और बलरामपुर अस्पताल के विशेषज्ञों के साथ तकनीकी एवं बायोमेडिकल इंजीनियर भी शामिल रहे। आरोप है कि परीक्षण के दौरान तीन कंपनियों के उपकरणों का प्रदर्शन कराया गया, जिनमें से दो कंपनियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया। इनमें कथित रूप से वह कंपनी भी शामिल थी, जिसे लेकर शिकायतकर्ता ने यूपीएमएससीएल पर पक्षपात के आरोप लगाए हैं। इसके बाद 29 जुलाई 2026 को दोबारा विशेषज्ञों की मौजूदगी में परीक्षण कराए जाने की बात कही जा रही है। शिकायत के अनुसार, इस दोबारा परीक्षण में भी संबंधित कंपनी निर्धारित तकनीकी मानकों पर खरी नहीं उतर सकी। यदि ये आरोप और दस्तावेज सही हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि **जब एक कंपनी तकनीकी परीक्षण में योग्य पाई गई और दूसरी कंपनी बार-बार तकनीकी मानकों पर खरी नहीं उतरी, तो पूरी निविदा को निरस्त करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?**

भारतीय कंपनी के नाम पर चीनी उपकरण का आरोप

मामले का दूसरा गंभीर पहलू ‘मेक इन इंडिया और वास्तविक निर्माता’ को लेकर उठ रहे सवाल हैं।
शिकायत में दावा किया गया है कि SYSMED MEDICAL TECHNOLOGIES PVT. LTD., Chandigarh को वेंटिलेटर के निर्माता के तौर पर प्रस्तुत किया गया, जबकि संबंधित मॉडल TOPNOTCH TV 15 के वास्तविक निर्माता को चीन की कंपनी SHENZHEN MINDRAY BIO-MEDICAL ELECTRONICS CO. LTD. बताया गया है। इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि भारतीय कंपनी की आड़ में चीनी उपकरण को निविदा में शामिल करने का प्रयास किया गया। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि के लिए निर्माता, अधिकृत वितरक, उत्पाद प्रमाणन और निविदा में जमा किए गए दस्तावेजों की मूल प्रतियों की जांच जरूरी होगी। इसलिए इन आरोपों को फिलहाल **शिकायतकर्ता के दावे** के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अधिकृत वितरक को लेकर भी सवाल

निविदा में शामिल HEIDELCO MEDICORE PVT. LTD. को लेकर भी शिकायत में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कंपनी ने इस निविदा में खुद को SYSMED MEDICAL TECHNOLOGIES PVT. LTD., Chandigarh का अधिकृत वितरक बताया। शिकायतकर्ता का दावा है कि अन्य निविदाओं में इसी कंपनी द्वारा अलग-अलग तरीके से अपनी भूमिका प्रस्तुत की जाती रही है और इस बार भी उसकी भूमिका तथा संबंधित उत्पाद के वास्तविक निर्माता को लेकर पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं। यहां असली सवाल दस्तावेजों से तय होगा— क्या अधिकृत वितरक का प्रमाणपत्र वैध था, किस तारीख को जारी हुआ था, किस उत्पाद और मॉडल के लिए था तथा क्या वह प्रमाणपत्र निविदा की शर्तों के अनुरूप था?

केजीएमयू की दूसरी खरीद प्रक्रिया का भी हवाला

शिकायत में GEM/2026/R/647614 का भी हवाला दिया गया है। सार्वजनिक उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार यह उत्तर प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग के लिए 53 आईसीयू वेंटिलेटरों की खरीद से संबंधित निविदा थी, जिसमें तीन बोलीदाताओं को तकनीकी रूप से योग्य बताया गया और शिलर हेल्थकेयर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को पुरस्कार मिला। हालांकि, इस निविदा में संबंधित TOPNOTCH TV 15 मॉडल की गुणवत्ता अथवा सेवा को लेकर केजीएमयू द्वारा की गई कथित टिप्पणी की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड से नहीं हो सकी है। इसलिए इस हिस्से की पुष्टि मूल तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट से किया जाना जरूरी है।

तीन साल से क्यों अटकी है खरीद?

वेंटिलेटर खरीद की प्रक्रिया लंबे समय से चलने का मुद्दा भी इस पूरे मामले को गंभीर बनाता है। यूपीएमएससीएल की सार्वजनिक निविदा सूची में इससे पहले भी आईसीयू वेंटिलेटर की निविदाएं दिखाई देती हैं। मसलन, अक्टूबर 2024 में भी आईसीयू वेंटिलेटर की निविदा सूचीबद्ध थी।
ऐसे में सवाल यह है कि यदि प्रदेश के अस्पतालों में वेंटिलेटरों की आवश्यकता है तो खरीद प्रक्रिया बार-बार तकनीकी अथवा अन्य कारणों से आगे क्यों नहीं बढ़ पा रही है? क्या हर बार वही कंपनियां तकनीकी कसौटी पर अटक रही हैं या निविदा की शर्तें और मूल्यांकन प्रक्रिया ही किसी विशेष परिणाम की ओर ले जा रही है? इन सवालों का जवाब यूपीएमएससीएल को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।

हाईकोर्ट की निगाह में मामला होने के बावजूद देरी?

शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि वेंटिलेटरों की कमी और उपलब्धता से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। यदि ऐसा है तो न्यायालय में दाखिल आदेश और हलफनामों से इसकी स्थिति स्पष्ट की जा सकती है। ऐसे संवेदनशील मामले में खरीद प्रक्रिया की प्रत्येक कड़ी—तकनीकी परीक्षण, विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट, पात्र और अपात्र कंपनियों की सूची, आपत्तियों का निस्तारण तथा निविदा निरस्त करने के कारण—सार्वजनिक जांच के दायरे में होनी चाहिए।

असली सवाल-टेंडर रद्द क्यों?

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि **यदि तकनीकी परीक्षण में एक या अधिक कंपनियां योग्य पाई गई हैं और अन्य कंपनियां अयोग्य घोषित हुई हैं, तो क्या केवल किसी पसंदीदा कंपनी के अयोग्य होने की स्थिति में पूरी निविदा को निरस्त किया जाना उचित होगा? यदि निविदा रद्द की जाती है तो उसका लिखित कारण क्या होगा? क्या तकनीकी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? क्या सभी कंपनियों को समान अवसर मिला? क्या तकनीकी परीक्षण की वीडियो रिकॉर्डिंग और विशेषज्ञों की टिप्पणियां उपलब्ध कराई जाएंगी? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या निविदा रद्द करने का निर्णय किसी तकनीकी आवश्यकता पर आधारित होगा या किसी विशेष कंपनी को दोबारा अवसर देने के लिए?**

‘या तो टेंडर हमारा, या टेंडर ही नहीं’ जैसी धारणा क्यों बन रही?

पूरे घटनाक्रम को लेकर शिकायतकर्ता का आरोप है कि प्रक्रिया ऐसी दिशा में बढ़ रही है जिससे यह धारणा बन रही है कि यदि कथित पसंदीदा कंपनी को निविदा नहीं मिलती है तो पूरी प्रक्रिया को ही खत्म कर दिया जाए। यही वह बिंदु है जहां यूपीएमएससीएल की पारदर्शिता की असली परीक्षा होगी। वेंटिलेटर कोई सामान्य सरकारी खरीद नहीं है। यह सीधे मरीज की जिंदगी से जुड़ा जीवनरक्षक उपकरण है।**
इसलिए इस खरीद में किसी भी कंपनी के पक्ष या विपक्ष से ज्यादा जरूरी है कि तकनीकी मानकों, गुणवत्ता, सेवा, वारंटी, सुरक्षा और लागत के आधार पर पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरी हो।

अब निगाह यूपीएमएससीएल के फैसले पर

221 वेंटिलेटरों की यह खरीद प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए यदि निविदा निरस्त होती है तो यूपीएमएससीएल को यह स्पष्ट करना होगा कि **तकनीकी समिति की रिपोर्ट में क्या कमियां पाई गईं, किस कंपनी को क्यों अयोग्य माना गया और योग्य कंपनी मौजूद होने के बावजूद पूरी निविदा रद्द करने का आधार क्या है। वहीं, यदि किसी कंपनी पर चीनी उत्पाद को भारतीय उत्पाद बताकर पेश करने, अधिकृत वितरक होने या तकनीकी पात्रता से जुड़े आरोप लगाए गए हैं तो संबंधित दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कराना भी जरूरी होगा। क्योंकि सवाल सिर्फ 221 वेंटिलेटरों की खरीद का नहीं है। सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की इस जीवनरक्षक उपकरण खरीद में फैसला तकनीकी योग्यता और मरीजों की जरूरत के आधार पर होगा या किसी कथित पसंदीदा कंपनी के हित के हिसाब से। अब देखना यह है कि यूपीएमएससीएल इस पूरे मामले में पारदर्शिता बरतते हुए तकनीकी परीक्षण रिपोर्ट और निविदा से जुड़े निर्णयों को सार्वजनिक करता है या फिर पूरी प्रक्रिया को एक बार फिर निरस्तीकरण के रास्ते पर ले जाता है।

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