CM की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामे के बाद फिर चर्चा में सूचना का ये अफसर


लखनऊ। सूचना विभाग की जिम्मेदारी केवल सरकार की योजनाओं और मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों की जानकारी मीडिया तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में मीडिया प्रबंधन, प्रवेश व्यवस्था और निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित करना भी विभाग की अहम जिम्मेदारी है। ऐसे में यदि किसी संवेदनशील कार्यक्रम की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने लगें तो विभाग के शीर्ष अधिकारियों के लिए यह गंभीर समीक्षा का विषय होना चाहिए।
भाजपा मुख्यालय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस वार्ता के दौरान एक महिला द्वारा सवाल पूछने के क्रम में हुए हंगामे के बाद सूचना विभाग में सहायक निदेशक के पद पर तैनात चंद्र विजय वर्मा का नाम भी चर्चाओं में है। वर्मा पीआर एजेंसी और प्रकाशन एनेक्सी एवं विधानसभा प्रेस रूम की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। खबर है कि लोकभवन में मीडिया के नाम पर बिना किसी प्रवेश पास के यूट्यूबर्स का प्रवेश लगातार बढ़ा है। चन्द्र विजय वर्मा अपना नाम चमकाने के लिए कई बार बाहर से यूट्यूबर्स की फौज बुलाते हैं और लोकभवन में उनकी एंट्री भी कराते हैं। विभागीय स्तर पर इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और लोकभवन के विभिन्न कार्यक्रमों के उपलब्ध वीडियो तथा प्रवेश रिकॉर्ड से सच तलाशने की आवश्यकता है। यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में निर्धारित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को प्रवेश मिलता है तो मामला केवल मीडिया प्रबंधन की चूक तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि सुरक्षा और प्रोटोकॉल से भी जुड़ जाएगा। सीएम के कार्यक्रमों में मीडिया की आड़ में अनधिकृत प्रवेश को लेकर सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही विशेष सतर्कता बरतती हैं। हालांकि कई यूट्यूबर्स बिना पास के कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं। इसके पीछे वर्मा जी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। शायद काम दिखाने और नाम चमकाने के चक्कर में ये किया जाता हो।
हालांकि यह चिंता और सुरक्षा का विषय है, वर्ष 2023 में प्रयागराज में माफिया अतीक अहमद की हत्या के दौरान हमलावर पत्रकारों के वेश में मौके तक पहुंचे थे। इस घटना ने वीआईपी सुरक्षा में मीडिया की पहचान और प्रवेश व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। ऐसे में मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील कार्यक्रमों में मीडिया प्रवेश की प्रक्रिया में किसी भी स्तर की लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सवाल सीधा है-जब प्रवेश के लिए निर्धारित प्रक्रिया मौजूद है तो उसका पालन किस स्तर पर और किसकी जिम्मेदारी में सुनिश्चित किया जा रहा है?
चंद्र विजय वर्मा की कार्यप्रणाली पर पहले भी उठे हैं सवाल
चंद्र विजय वर्मा की कार्यप्रणाली को लेकर विभाग के भीतर समय-समय पर असंतोष और शिकायतों की चर्चाएं सामने आती रही हैं। पूर्व सूचना निदेशक शिशिर सिंह के कार्यकाल से लेकर वर्तमान निदेशक विशाल सिंह के कार्यकाल तक उनकी कार्यशैली को लेकर सवाल उठने की बातें कही जाती रही हैं। यह भी चर्चा है कि उन्हें कई मौकों पर अधिकारियों की नाराजगी अथवा फटकार का सामना करना पड़ा। विभागीय हलकों में यह चर्चा भी सुनने को मिलती है कि वर्मा स्वयं को शीर्ष अधिकारियों का करीबी बताकर अपना प्रभाव कायम रखने की कोशिश करते हैं। उच्च अधिकारियों का हवाला देकर वह कई बार अपना रौब दिखाते रहे हैं। हालही में उत्तर प्रदेश सरकार की सरकारी संदेश मैग्जीन में सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं पर स्वतंत्र लेख लिखने वाले एक पत्रकार का नाम उन्होंने व्यक्तिगत कुंठा के चलते सम्मान सूची से बाहर कर दिया था। हालांकि इसको लेकर बाद में उन्हें फटकार लगाई गई थी। ऐसे कारनामें उनके लिए मामूली हैं। तमाम कार्यक्रमों में पास वितरण में भी उनकी अनियमितताओं से सभी वाकिफ हैं। इससे पूर्व में भी कई बार ये विभाग की किरकिरी कराते रहे हैं। अक्सर निदेशक के अच्छे कार्यों के बजाये इनके कारनामों की चर्चा ज्यादा हो जाती है।
भाजपा मुख्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला का सवाल भी चर्चा में
भाजपा मुख्यालय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक महिला द्वारा पूछे गए सवाल और उसके बाद हुए हंगामे को लेकर भी सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। पत्रकारों के बीच भी यह चर्चा आम है। प्रेस वार्ता का वीडियो सामने आने के बाद कुछ लोग महिला के सवाल को बेबाक पत्रकारिता का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि सवाल पूछने का तरीका और मौके का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर चर्चा हासिल करना है। इन दावों पर अंतिम निष्कर्ष से पहले पूरे घटनाक्रम और संबंधित तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है-क्या संवेदनशील राजनीतिक कार्यक्रमों में मीडिया की भूमिका केवल पत्रकारिता तक सीमित है या सोशल मीडिया की लोकप्रियता और व्यक्तिगत ब्रांडिंग भी अब उसके तौर-तरीकों को प्रभावित कर रही है? यह बहस किसी एक महिला या किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यूट्यूब, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में लोग स्वयं को पत्रकार या मीडिया प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। ऐसे में सरकारी और राजनीतिक कार्यक्रमों में मीडिया की पहचान, प्रवेश और आचरण को लेकर स्पष्ट नियम बनाना और उनका समान रूप से पालन कराना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।
मीडिया की आजादी जरूरी, लेकिन प्रोटोकॉल भी उतना ही अहम
मीडिया की संख्या बढ़ना लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है। नए प्लेटफॉर्म और डिजिटल पत्रकारिता ने आम लोगों को अपनी बात रखने का अवसर दिया है। लेकिन मीडिया की बढ़ती पहुंच और वीआईपी सुरक्षा के बीच संतुलन कायम करना भी उतना ही जरूरी है। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में कौन प्रवेश करेगा, किस आधार पर प्रवेश मिलेगा, उसकी पहचान कैसे सत्यापित होगी और कार्यक्रम के दौरान उसकी जिम्मेदारियां क्या होंगी-इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब व्यवस्था के पास होने चाहिए। इस पूरे घटनाक्रम में किसी एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहराने से पहले तथ्यों की जांच जरूरी है। लेकिन यदि सूचना विभाग से जुड़े किसी अधिकारी की भूमिका को लेकर बार-बार सवाल उठ रहे हैं, तो शीर्ष स्तर पर इसकी समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है। क्योंकि मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की पहली कड़ी है। और इस कड़ी में छोटी-सी चूक भी आगे चलकर बड़ा सवाल बन सकती है।
सूचना निदेशक विशाल सिंह को इस विषय पर भी चिंतन करने की आवश्यकता है।




