सीएम ने खोला रास्ता, विभाग ने रोकी रफ्तार, 9 महीने से महिला शिक्षामित्रों को पति के जिले का इंतजार


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों के प्रति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 3,500 रुपये पाने वाले शिक्षामित्रों के मानदेय में योगी सरकार के कार्यकाल में दो बार बढ़ोतरी हुई। हाल ही में सरकार ने शिक्षामित्रों के मानदेय में सीधे 8,000 रुपये की बढ़ोतरी करते हुए इसे 18,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया। प्रदेश के करीब 1.43 लाख शिक्षामित्र इस बढ़ोतरी से लाभान्वित हो रहे हैं। लेकिन इसी वर्ग की एक दूसरी बड़ी और वर्षों पुरानी समस्या पर बेसिक शिक्षा मंत्री और अपर मुख्य सचिव की सुस्ती अब सवाल खड़े कर रही है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल पर विवाहित महिला शिक्षामित्रों को उनके पति के घर यानी ससुराल वाले जिले में तैनाती का रास्ता खोलने के लिए 9 दिसंबर 2025 को शासनादेश जारी हुआ था। शासनादेश जारी हुए करीब नौ महीने गुजर चुके हैं और सितंबर का आधा महीना भी बीतने को है, लेकिन हजारों विवाहित महिला शिक्षामित्र आज भी अपने पति और बच्चों के घर पहुंचने का इंतजार कर रही हैं। मुख्यमंत्री की मंशा स्पष्ट थी, शासनादेश भी जारी हो गया और प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए, फिर भी बेसिक शिक्षा विभाग की रफ्तार सवालों के घेरे में है। आखिर मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद भी बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह और प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा पार्थ सारथी सेन शर्मा किस गति से फाइल चला रहे हैं यह बड़ा सवाल है। जब सीएम ने रास्ता खोल दिया तो विभाग उस रास्ते को मंजिल तक पहुंचाने में इतना समय क्यों ले रहा है? सवाल अब सिर्फ तबादले का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की पहल को जमीन पर उतारने की विभागीय इच्छाशक्ति का भी है। आखिर सीएम की मंशा पर विभागीय फाइलों का यह ब्रेक कब हटेगा और मूल विद्यालय में वापसी और विवाहित महिला शिक्षामित्रों की पति के ‘घर वापसी’ का आदेश कब परवान चढ़ेगा?
सीएम के निर्देश के बाद भी देरी
मुख्यमंत्री की पहल के बाद 9 दिसंबर 2025 को शासनादेश जारी हुआ। शासनादेश में शिक्षामित्रों से विकल्प लेने और निर्धारित परिस्थितियों में मूल विद्यालय अथवा अन्य विद्यालय में तैनाती की प्रक्रिया का रास्ता खोला गया। विवाहित महिला शिक्षामित्रों के लिए पति के निवास वाले ग्राम सभा, ग्राम पंचायत या वार्ड में स्थित परिषदीय विद्यालय में तैनाती का विकल्प भी रखा गया। लेकिन सितंबर 2026 आ चुका है। शासनादेश को करीब नौ महीने बीत चुके हैं। विकल्प लिए जाने और जिला स्तर पर सूचनाएं जुटाए जाने के बावजूद विवाहित महिला शिक्षामित्रों की ‘घर वापसी’ अब भी पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर सकी है।
क्या कहा था मंत्री ने
लगभग 4 माह पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह की लोकभवन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार द्वारा महिला शिक्षामित्रों के तबादले में देरी संबंधित सवाल पूछा तो मंत्री जी ने कहा कि काम चल रहा है, हालांकि अब तक चल री रहा है हुआ कुछ नहीं। ऐसे में सवाल है कि जब रास्ता खोल दिया गया है तो मंजिल तक पहुंचने में इतना समय क्यों लग रहा है? अगर विभाग के पास कोई व्यावहारिक, प्रशासनिक या कानूनी अड़चन है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अगर कोई अड़चन नहीं है तो फिर प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हो रही?
मंत्री और सचिव ने किया निराश
महिला शिक्षामित्रों का इंतजार किसी सामान्य विभागीय फाइल का इंतजार नहीं है। इनमें बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जिनकी शादी के बाद उनका परिवार एक जिले में और नौकरी दूसरे जिले में रह गई। नौकरी बचाने के लिए उन्हें रोजाना लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में मंत्री से यह पूछना स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री ने संवेदनशीलता दिखाई तो विभाग उस संवेदनशीलता को अमल में लाने में पीछे क्यों है? बेसिक शिक्षा विभाग के प्रशासनिक मुखिया के तौर पर अपर मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। शासनादेश जारी होने के बाद विभागीय मशीनरी को यह सुनिश्चित करना था कि प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से आगे बढ़े। यदि जिलों से विवरण मांगा गया, विकल्प लिए गए और सूचनाएं एकत्र हुईं तो फिर अंतिम कार्रवाई किस चरण में अटकी हुई है?
सीएम का आदेश कागज से जमीन पर कब?
शासनादेश के क्रम में तत्कालीन बेसिक शिक्षा निदेशक एसपी सिंह बघेल ने प्रदेश के सभी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को पत्र भेजकर शिक्षामित्रों से संबंधित डाटा जुटाने के निर्देश दिए थे। जिला स्तर पर डाटा कलेक्शन की प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन इसके बाद विभागीय स्तर पर इसकी निगरानी और अगली कार्रवाई की रफ्तार थम गई। इस बीच तत्कालीन निदेशक का तबादला हो गया और नए निदेशक ने कार्यभार संभाल लिया। लापरवाही का आलम यह है कि डाटा जुटाने के बाद आगे क्या कार्रवाई हुई, इसकी स्पष्ट जानकारी न तो कई बीएसए स्तर पर दिखाई दे रही है और न ही निदेशालय स्तर से इस संबंध में कोई ठोस फॉलोअप सामने आया है। यही प्रशासनिक सुस्ती इस पूरी प्रक्रिया में देरी की बड़ी वजह बनती नजर आ रही है। किसी भी सरकारी आदेश की असली परीक्षा उसके जारी होने में नहीं, बल्कि उसके जमीन पर क्रियान्वयन में होती है। दिसंबर 2025 में शासनादेश जारी हुआ, शिक्षामित्रों से विकल्प लिए गए और जिला स्तर पर डाटा जुटाने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। इसके बाद उम्मीद थी कि अब अंतिम तैनाती की कार्रवाई जल्द पूरी होगी और विवाहित महिला शिक्षामित्रों को अपने परिवार के पास जाने का अवसर मिलेगा। लेकिन सितंबर 2026 में भी शिक्षामित्र संगठन मूल विद्यालय वापसी और स्थानांतरण की मांग को लेकर आवाज उठा रहे
विवाहित महिला शिक्षामित्रों को अब सीएम से ही उम्मीद
किसी महिला के लिए शादी के बाद पति और परिवार से अलग किसी दूसरे जिले में नौकरी करना आसान नहीं होता। बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की जिम्मेदारी, घर-परिवार और रोजाना की लंबी दूरी की यात्रा के बीच नौकरी करना उनके लिए लगातार चुनौती बना हुआ है। यही वजह है कि कई विवाहित महिला शिक्षामित्र वर्षों से अपने पति और परिवार से दूर नौकरी करने को मजबूर हैं।
- एक महिला शिक्षामित्र का कहना है, “शासनादेश जारी होने के बाद हमें लगा था कि अब वर्षों से चली आ रही परेशानी खत्म होगी और हम अपने पति व परिवार के पास रहकर नौकरी कर सकेंगे। विकल्प भी लिया गया, लेकिन अब तक अंतिम आदेश का इंतजार है। आखिर हमें और कितना इंतजार करना होगा?”
- बराबंकी जनपद में तैनात एक महिला शिक्षामित्र के मुताबिक, “हम नौकरी छोड़ना नहीं चाहते, सिर्फ इतना चाहते हैं कि सरकार हमें परिवार के साथ रहने का अवसर दे। रोजाना लंबी दूरी तय करने से समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं। बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियां भी प्रभावित होती हैं।”
- एक महिला शिक्षामित्र ने विभागीय देरी पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब मुख्यमंत्री की पहल पर शासनादेश जारी हो चुका है और हमसे विकल्प भी मांगा जा चुका है तो फिर आगे की प्रक्रिया क्यों नहीं पूरी की जा रही? हमें अब किसी नए आश्वासन की जरूरत नहीं है, हमें सिर्फ यह बताया जाए कि आदेश कब जारी होगा।”
इन महिलाओं की परेशानी सिर्फ नौकरी की जगह बदलने तक सीमित नहीं है। यह उनके परिवार, बच्चों और वैवाहिक जीवन से जुड़ा सवाल है। कई महिलाएं चाहती हैं कि सरकार उन्हें ऐसी तैनाती दे, जिससे वे नौकरी के साथ अपने परिवार की जिम्मेदारियां भी निभा सकें। मुख्यमंत्री से उम्मीद इसलिए भी जुड़ी है क्योंकि पहल उन्हीं के स्तर से हुई थी। अब महिला शिक्षामित्रों को भरोसा है कि मुख्यमंत्री की नजर इस लंबित प्रक्रिया पर पड़ेगी और विभागीय फाइलों में अटकी उनकी ‘घर वापसी’ का रास्ता जल्द साफ होगा।
अगर सीएम ने पूछ लिया सवाल तो क्या देंगे जवाब?
- सीएम की पहल तेज, विभाग की रफ्तार इतनी धीमी क्यों?
- फाइल किस स्तर पर अटकी है?
- किस अधिकारी की मेज पर कार्रवाई रुकी है?
- जिलों से मांगी गई सूचनाओं का क्या हुआ?
- विकल्प लेने के बाद अंतिम सूची कब जारी होगी?
- मंत्री जी, मुख्यमंत्री की मंशा लागू कराने में आखिर दिक्कत क्या है?
- विभाग आखिर इतनी धीमी गति से क्यों चल रहा है?
- शासनादेश देने के बाद आला अफसर क्यों कुंभकर्णी नींद में चले गए?
- शासनादेश के क्रियान्वयन में देरी का जवाब कौन देगा
- क्या विभाग के पास इस प्रक्रिया की कोई समयसीमा है?
- क्या जिलों से प्राप्त आंकड़ों की जांच पूरी हो चुकी है?
- क्या अंतिम सूची तैयार है?
- अगर तैयार है तो आदेश कब?
- यदि तैयार नहीं है तो नौ महीने में विभाग इसे पूरा क्यों नहीं कर सका?
- कितने शिक्षामित्रों ने विकल्प दिया?
- कितने मामलों का सत्यापन पूरा हो चुका है?
- कितने मामले लंबित हैं?
- अंतिम सूची कब जारी होगी?
- तैनाती आदेश कब तक जारी किए जाएंगे?
- यदि किसी स्तर पर अड़चन है तो वह अड़चन क्या है?
- नौ महीने किया इंतजार अभी और कितना?



