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समग्र चेतना ने कसी कमर, ‘अपवादों का अभिनंदन’ से शुरू होगा उत्तराखंड में सृजन का नया अध्याय

  • ब्लॉक स्तर पर खोजे जाएंगे ‘नायक’, देवभूमि को बनाएंगे वैश्विक मॉडल | 
  • ‘मैं’ के विसर्जन से ‘सब’ के सृजन तक
  • समग्र चेतना ने उत्तराखंड की धरती से एक मौन क्रांति का ऐलान किया है -‘अपवादों का अभिनंदन’।
डॉ सुयश नारायण
Dr. Suyash Narayan Mishra

देहरादून। समग्र चेतना संगठन ने उत्तराखंड में समाज निर्माण का नया बीड़ा उठाया है। संगठन अब ‘अपवादों का अभिनंदन’ अभियान चलाएगा। ये अपवाद कौन हैं? वो जो सिस्टम में रहकर भी सिस्टम जैसे नहीं हुए। वो पटवारी जो रिश्वत नहीं लेता। वो शिक्षक जो अपने खर्च पर बच्चों को पढ़ाता है। वो युवा जो पहाड़ से पलायन की जगह पलायन रोकने का विकल्प रचता है। समाज इन्हें अपवाद कहता है, समग्र चेतना इन्हें ‘आधार’ बनाना चाहती है।

शोध क्या होगा?

संगठन गांव-गांव जाकर इन ‘अपवादों’ की कहानियां खोजेगा। फिर इन बिखरी हुई उंगलियों की ‘मुट्ठी’ बनाएगा। इसके तहत ब्लॉक स्तर पर उन व्यक्तियों की पहचान की जाएगी जिन्होंने समाज, राष्ट्र और देवभूमि के लिए निस्वार्थ भाव से काम किया है, लेकिन मुख्यधारा में उन्हें वो पहचान और सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था।

मैं’ से ‘सब’ तक का सफर

संगठन के संस्थापक रिटायर्ड आईएएस डॉ कमल टावरी ने कहा कि देश में सबसे बड़ी समस्या ‘मैं’ के विसर्जन की है। जब तक ‘मैं’ नहीं मिटेगा, ‘हम’ नहीं बनेगा। और ‘हम’ के बिना ‘वो’ यानी व्यवस्था नहीं बदलेगी। समग्र चेतना का लक्ष्य ‘मैं से हम, हम से वो, और फिर सब’ की यात्रा पूरी करना है। इसके लिए गांव-गांव जाकर पुरानी गलतियों को सुधारते हुए वैश्विक संकटों को अवसर में बदलना होगा।

उत्तराखंड बनेगा मॉडल

समग्र चेतना का मानना है कि “हमें ‘अपो दीपो भव’ की राह पर चलना है”। देवभूमि की शुद्धता, संस्कृति और चेतना को आधार बनाकर उत्तराखंड को एक मॉडल के रूप में खड़ा किया जाएगा। फिर इसी मॉडल को वैश्विक अभियान का रूप दिया जाएगा।

हम कुछ मौलिक सवाल लेकर जनता से संवाद करेंगे

  1. क्या देवभूमि से ‘शुद्धता की सप्लाई’ शुरू हो सकती है? यानी विचार, पर्यावरण और आचरण की शुद्धता का निर्यात।

  2. क्या ‘कथा से क्रांति’ संभव है? यानी विमर्श और वैचारिकी से व्यवस्था परिवर्तन।

  3. क्या ‘विकल्प बेचना’ धंधा हो सकता है? यानी सकारात्मक विकल्प देना ही नया उद्यम।

  4. क्या ‘शुद्धता की मार्केटिंग’ हो सकती है? यानी अच्छे काम को ब्रांड बनाना, ताकि युवा जुड़ें।

‘अ-सरकारी’ से ‘असरकारी’ तक

समग्र चेतना ने ‘अ-सरकारी’ और ‘असरकारी’ पत्रकारों, पर्यावरणविदों और समाजसेवियों से आह्वान किया है कि वे इस ‘प्रेरित पर्यावरणीय परिवर्तन’ का हिस्सा बनें। संगठन का मानना है कि सरकारें बदलती हैं, पर समाज तभी बदलता है जब ‘अपवाद’ लोग ‘उदाहरण’ बनते हैं। “मुट्ठी बनाकर लड़ना होगा” — संगठन का कहना है कि बिखरे हुए अच्छे लोगों को एकजुट कर एक ‘मुट्ठी’ बनानी है, तभी वैश्विक चुनौतियों से लड़ा जा सकता है।

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