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व्यंग्य और विद्वता में अंतर होता है!

 

हाथ में समाजवादी झंडा, और लहजा इतना गंदा! राजनीति में कुछ लोग विचार लेकर आते हैं, कुछ लोग संघर्ष लेकर और कुछ लोग सिर्फ वायरल क्लिप लेकर । भाटी जी शायद तीसरी जमात के उभरते हुए सितारे हैं। ऐसी भाषा तो लोग अपने दुश्मनों के लिए भी इस्तेमाल करने से बचते हैं। लेकिन आजकल कुछ नेताओं ने समझ लिया है कि जितनी कड़वी ज़ुबान, उतनी बड़ी क्रांति। मानो विचारधारा नहीं, बदज़ुबानी की परीक्षा दे रहे हों और प्रथन आने की खुजली मची हो।

भाटी जी आखिर कब इतने “लुटे, पिटे और कुटे” गए — पता नहीं, लेकिन हर दूसरे वाक्य में जो पीड़ा, गुस्सा और जातीय खुजली फूट पड़ती है, उससे लगता है जैसे इतिहास ने अन्याय का पूरा ठेका अकेले इन्हीं पे दे मारा है। वैसे हमारे यहाँ ऐसे लोगों नकली कहा जाता है, क्योंकि असली समाजवादी समाज को जोड़ता है, जातियों में माचिस नहीं लगाता। असली नेता बहस करता है, भड़काता नहीं। और असली बुद्धिजीवी तर्क देता है, तंज की आड़ में अपनी कुंठा नहीं बेचता।

लेकिन आजकल राजनीति में एक नई नस्ल पैदा हो गई है —“व्हाट्सऐप प्रमाणित क्रांतिकारी। नस्ल”

शायद नेताजी ने सोचा होगा कि मंच से दो-चार जातीय तंज फेंक देने भर से वैचारिक क्रांति आ जाएगी। लेकिन जनता जानती है कि ज्ञान और गूगल में, व्यंग्य और बदज़ुबानी में फर्क होता है। कबीर ने कहा था — ‘जाति न पूछो साधु की।’ लोहिया जी ने सामाजिक बराबरी की बात की। अंबेडकर ने सम्मान आधारित समाज का सपना रखा। लेकिन भाटी जी किस व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के “मुहावरा विभाग” विभाग में शोध कर ऐसा प्राचीन ज्ञान उड़ेल रहे हैं।

 

 

भाटी जी शायद यह भूल गए कि व्यंग्य और विद्वता में फर्क होता है।
विद्वता समाज को ऊपर उठाती है।
व्यंग्य सत्ता से सवाल करता है।
लेकिन सस्ता तंज सिर्फ ट्रोल्स को कंटेंट देता है और टीवी डिबेट को मसाला।

ब्राह्मणों पर टिप्पणी करके उन्हें लगा होगा कि उन्होंने कोई वैचारिक तीर मार दिया है।
जबकि जनता सोच रही थी —
“अगर यही बौद्धिकता है, तो मोहल्ले की चाय की दुकान पर बैठे शर्मा जी आपसे बड़े दार्शनिक निकले।”

 

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