नाम टावरी है और इरादे टावर हैं


लखनऊ। कमर थोड़ी झुकी है, पर कंधे पर उम्र का बोझ नहीं दिखता। आज भी टावर की तरह तने हुए हैं। वहीं सोच, वही जज्बा और कुछ कर गुजरने की ललक। जब दुनिया रिटायरमेंट की स्कीम बनाती है, वह ‘नेशनल स्कीम’ लेकर गांव-गांव घूम रहे हैं। सूटकेस नहीं, एक झोला। काफिला नहीं, सिर्फ नौजवानों की टोली। यही है डॉ. कमल टावरी का असल जीवन। फौज से फकीरी तक, पर मिशन वही, सोया हुआ भारत जगाना है युवाओं को स्वावलंबी बनाना है।
“मैं युवाओं को भीख का कटोरा नहीं, हक की लाठी थमा रहा हूं। नौकरी के पीछे दुम हिलाकर मत दौड़ो, 10 को नौकरी देने वाला शेर बनो। गांव की गौशाला को ATM बनाओ, गोबर से सोना निकालो। यही असली आजादी है, यही है मेरा ‘ग्राम ऊर्जा स्वराज’!”
– टावरी का मूल मंत्र
कंधे पर अब बंदूक नहीं जिम्मेदारी है। शरीर पर वर्दी नहीं खादी है। उम्र के इस पड़ाव में भी एक मसाल उठा ली है सोए हुए भारत को जगाने की। युवाओं को स्वावलंबी बनाने की। हाथ में अब कलम नहीं, हौसला है – उन्हें स्वाभिमानी बनाने का। वर्दी अब जैतूनी नहीं, खादी है, और जंग का मैदान अब बॉर्डर नहीं, गांव है। मिशन वही है – ‘ग्राम ऊर्जा स्वराज’।
ये दास्तान है डॉ. कमल टावरी की। एक शख्स, तीन जिंदगियां – पहले फौज का कर्नल, फिर सिस्टम का अफसर, अब संन्यासी। किरदार बदले, जिम्मेदारी बदली, पर कलेजे में धड़कता मंत्र एक ही रहा: ‘राष्ट्र प्रथम, राष्ट्र अंतिम।
6 साल सरहद, 22 साल फाइलें, अब उम्रभर का फकीरी
1 अगस्त 1946 को वर्धा में जन्मे कमल टावरी ने पहले देश की रक्षा के लिए कर्नल की वर्दी पहनी। 6 साल सेना में रहकर अनुशासन सीखा। फिर 1968 में UPSC निकालकर यूपी कैडर के IAS बने।
22 साल तक ग्राम्य विकास, पंचायती राज, खादी, ग्रामोद्योग जैसे विभागों में सचिव रहे। कहते हैं, सरकार जिसे ‘सजा पोस्टिंग’ समझकर भेजती, टावरी उसे ‘तीर्थ’ बना देते। पिछड़े ब्लॉक को मॉडल बनाया, खादी को फैशन नहीं, ‘फिलॉसफी’ बनाया।
29 साल की लड़ाई: ‘साहब’ का स्वाभिमान
1983 की बात। IAS कमल टावरी और IPS एसएम नसीम ने एक संदिग्ध बस का 15 किमी पीछा किया। बस रुकी तो ड्राइवर-कंडक्टर ने दोनों अफसरों पर हमला कर दिया। FIR हुई, पर फाइल गायब। टावरी झुके नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट तक गए। 29 साल लड़े। 26 मार्च 2012 को फैसला आया – दोनों आरोपी को 3-3 साल कैद।
टावरी का तर्क था: “जिले का मालिक अगर अपने अपमान पर चुप रहे, तो आम आदमी का क्या होगा? अफसर की कुर्सी नहीं, उसका जमीर बड़ा होना चाहिए।”
एक संकल्प: आजीवन खादी
ग्राम्य विकास सचिव रहते एक दिन तय किया – ‘अब शरीर पर सिर्फ खादी रहेगी’। तब से सूट-बूट त्याग दिया। कहते हैं, “खादी कपड़ा नहीं, चरित्र है। गांधी का सपना, गरीब का स्वाभिमान है।”
2006 में VRS, 2022 में संन्यास, अब ‘युवा-सेना’ तैयार
2006 में IAS से रिटायर हुए। पर रुकना सीखा ही नहीं। 40 किताबें लिखीं। LLB किया, इकोनॉमिक्स में PhD की। युवाओं को स्वरोजगार और तनाव-मुक्त जीवन का मंत्र देने लगे।
78 की उम्र में नया युद्ध: ‘देश जागरण’
अब डॉ. टावरी एक नई टोली बना रहे हैं -पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं की। नारा है: ‘तंत्र बदलेगा, जब युवा बदलेगा’। 21 से 24 मई तक वे देहरादून में हैं। कॉलेज-गांव-गौशालाओं में जाकर ‘स्वावलंबी युवा, स्वाभिमानी भारत’ का पाठ पढ़ा रहे हैं।
(दिल्ली से प्रकाशित हिंदी मासिक समग्र चेतना मैग्जीन में इस बार प्रकाशित होगी।




