छत्तीसगढ़शिक्षासमग्र समाचार

सम्यक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास हो

प्रदीप छाजेड
प्रदीप छाजेड

भारत में बहुत अच्छे ग्रंथ हैं यह बहुत अच्छी चीज हैं । संस्कृत, पाली और अन्य कईं अन्य भाषाओं में अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं । इन ग्रंथों में संग्रहित अच्छी वाणीयां भी अपने आप में रत्न होती हैं । आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने कहा कि व्यक्ति को अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए स्वाभिमान रखना आवश्यक है | पर अभिमान अस्तित्व के लिए खतरा है | पूज्य गुरुदेव कहते थे कि व्यक्ति अपने आपको ऊंचा और दूसरों को हीन मानकर आत्मोकर्ष करता है, यह उसका अभिमान है, आत्महनन है, जो हिंसा का ही एक रूप है | उनके अभिव्यक्त विचार हर किसी की अहं चेतना पर चोट करने में सक्षम हैं – मेरे चित्त पर कभी-कभी अभिमान की छाया आ जाती है |

मैं चौंककर उसे देखता हूं और सोचता हूं कि मैं अभिमान किस बात का करूं ? ज्ञान का ? संसार में अनेक व्यक्ति ऐसे हैं, जो अनेक क्षेत्रों में मेरे से अधिक ज्ञानी हैं | कुछ विषय ऐसे भी हैं, जिनका मैं ककहरा भी नहीं जानता | यदि मेरे पास केवलज्ञान होता तो संभवतः अभिमान का प्रसंग हो सकता था | पर केवलज्ञानी अभिमानमुक्त होते हैं | तो क्या तप का अभिमान करूं ? मैंने तो बेले-तेले ही किये हैं ? भगवान् महावीर तो छह-छह माह की तपस्या सहज ही कर लेते थे | यह भी नहीं तो क्या बुद्धि का अभिमान करूं ? अभयकुमार जैसी बुद्धि हो तो भले ही अभिमान किया जा सके, पर अभयकुमार और स्थूलिभद्र की 7 बहिनों जैसी बुद्धि कहां ? इसी प्रकार बाहुबलि जैसा बल होता तो बल पर अभिमान करने का प्रसंग हो सकता था | दर्शन की दृष्टि से क्षायक सम्यक्त्व और चारित्र की दृष्टि से क्षायक चारित्र होता तो अभिमान का विषय बनता | इसी प्रकार सनत्कुमार और मघवागणी जैसा मेरा रूप होता तो अभिमान का हेतु बनता |

अन्यथा रूप का भी क्या अभिमान करना ? ऐश्वर्य का भी कैसा अभिमान ? शालिभद्र जैसा ऐश्वर्य कहां ? मैं तो सोचता रहता हूं कि जिन लोगों के पास यह सब था, उन्हें भी अभिमान नहीं हुआ तो मेरे पास तो अभिमान करने लायक कुछ है ही नहीं, फिर अभिमान किस बात का करूं ? मेरी स्पष्ट मान्यता है कि मैं महान हूं , आकर्षक वक्ता हूं , प्रमुख लेखक हूं , कवि हूं आदि – आदि ये सब अभिमान के चिन्ह हैं | साधक को इन सब अहंमान्यताओं से ऊपर उठना चाहिए | पूज्य गुरुदेव की आत्मतेज युक्त यह अनुभवपूत वाणी अहंकार की जड़ों पर प्रहार कर विनम्रता की नयी पौध लगाने में सक्षम होगी ऐसा मेरा ( आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ) विश्वास है | संस्कृत में कहा गया हैं कि धरती पर तीन रत्न हैं- पानी, अनाज और सुभाषित अच्छी वाणी भी एक रत्न होती हैं ।

शास्त्रों की कल्याणी वाणी से हमें मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता हैं । भारत का यह सौभाग्य हैं कि यहां की धरती पर अनेक संत हुए हैं और आज भी हैं । ऐसे ज्ञानी संतो के उपदेश हमको सुनने को मिले वह मिल रहें हैं तो इससे समय भी सार्थक हो सकता हैं । वह जीवन को अच्छी दिशा भी मिल सकती हैं । यह कोई नहीं बता सकता कि उसकी आख़िरी सांस कौन सी होगी ? हर व्यक्ति यही सोचता है कि अभी मेरे जाने का समय आया नहीं।यह मिथ्या है। वर्तमान समय भौतिक्ता वाला है।इस चकाचौंध भरी दुनियां में दौलत के पीछे इंसान इस क़दर पागल हो गया कि वो धन प्राप्त करने के चक्कर में अपना सुख-चैन खो रहा है। उसके ना जीवन में शांति है,ना पर्याप्त नींद है,ना परिवार के लिये समय है और वह जिस शरीर से काम ले रहा है उसको स्वस्थ रखने के लिये भी समय नहीं है। जीवन में असली सुख की परिभाष देखनी है तो हम्हें देखना चाहिये हमारे पूर्वजों का जीवन। उनका जीवन सादा,सरल,सच्चा और संतोषी था।वह बड़ा परिवार होने के बावजूद वो अपना जीवन शांति से बिताते थे। इंसान अपनी ख्वाहिशें सीमित करदे तो जीवन में अपने आप शांति आ जायेगी। शास्त्र में कहा गया हैं कि- स्वयं सत्य खोजो ।

आदमी सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करे । अध्यात्म जगत में साधना द्वारा सच्चाईं की शोध और सच्चाई की प्राप्ति हो सकती हैं । ज्ञान इन्द्रियों की सहायता से भी हो सकता हैं । दूसरा ज्ञान अतीन्द्रिय होता हैं, जो इन्द्रियों और मन की सहायता के बिना प्राप्त होता हैं । पहली प्रकार का ज्ञान परोक्ष और दूसरी प्रकार का ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान होता हैं जो भीतर से प्रकट होता हैं । ज्ञान का हमारे जीवन में बहुत महत्व हैं । ज्ञान एक पवित्र तत्व हैं । वह ज्ञान के साथ हमारा आचरण भी अच्छा बनता हैं । आत्मा की चार अनंत शक्तियां – ज्ञान, दर्शन,आनंद और वीर्य हैं ।ज्ञानावरणीय क्षयोपशम से हमारी ज्ञान चेतना, दर्शनावरणीय क्षयोपशम से दर्शन चेतना का विकास होता हैं ।

मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से राग – द्वेष मुक्त चेतना विकास करती हैं । और अंतराय कर्म के क्षयोपशम से आनंद का विकास होता है। यही सब शक्तियों को संचालित करने वाली और महाशक्ति महा वीर्य का विकास है। अध्यात्म साधना द्वारा इस शक्ति का विकास संभव हैं । खाने का संयम ,तप का प्रयोग व सम्यक् दृष्टिकोण आदि बने यही प्रयास रहे । नवकार मन्त्र के जाप से पवित्र वातावरण का निर्माण होता हैं । उससे अध्यात्म सिर्फ समझने का ही नहीं ,जीने का अवकाश मिल पायेगा। वह इसके आगे कुछ और शेष नहीं होगा । अतः हमारा भाव विशुद्धता चित्त और मन की निर्मलता का निरंतर अभ्यास चले । यही हमारे लिए काम्य हैं ।

प्रदीप छाजेड़ (बोरावड़ )
पता – प्रदीप छाजेड,छाजेड़ सदन, गणेश डूँगरी गेट के पास, सबलपुर रोड़, जिला – डीडवाना- कुचामन, राज्य – राजस्थान, पोस्ट – बोरावड़, पिन -341502
नम्बर -9993876631

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