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सिपाहियों के हवाले अन्ना की नई पारी – देहरादून में तर्पण या तपस्या?

डॉ सुयश नारायण
Dr. Suyash Narayan Mishra

देहरादून जनलोकपाल की चिंगारी से दिल्ली की कुर्सी हिलाने वाले अन्ना के कंधे पर चढ़कर कई लोग मुख्यमंत्री और राज्यपाल की कुर्सी तक पहुंच गए। पर जिस अन्ना ने रालेगण से निकलकर दिल्ली को झुका दिया था, वो आज फिर रालेगण की उसी पगडंडी पर अकेला खड़ा है।

23 मई को उत्तराखंड में फिर ‘राष्ट्रीय लोक आंदोलन – टीम अन्ना’ की बैठक जुट रही है। सवाल आग की तरह दहक रहा है कि क्या इस बार भी अन्ना का नाम भुनाया जाएगा या पहली बार जमीन पर हल चलेगा?

समग्र चेतना रिटायर्ड आईएएस डॉ. कमल टावरी के 50 साल के तजुर्बे से निकले ‘ब्लॉक अडॉप्शन मॉडल’ के साथ अब जमीन पर उतरने जा रहा है । अन्ना मूवमेंट  देश के इतिहास में बड़ी सीख होनी चाहिए। एक 90 साल के व्यक्ति के संघर्ष से खड़ा हुआ इतना बड़ा जन आंदोलन ने हमें क्या सिखाया।

सवाल सीधा है, क्या चूका, क्या छूटा और आगे क्या?

1. क्या चूका अन्ना?

2011 में रामलीला मैदान से जो आंधी उठी थी, वो संसद तो पहुंची पर सिस्टम नहीं बदल पाई। जनलोकपाल बिल आया, पर दांत-नाखून नोचकर। टीम अन्ना टूटी। केजरीवाल कुर्सी पर, किरण बेदी राजभवन में, और अन्ना फिर रालेगण सिद्धि में। चूक यहीं हुई। आंदोलन को चेहरों ने खा लिया। मुद्दा पीछे छूट गया। भ्रष्टाचार आज भी फाइलों में ‘अंडर प्रोसेस’ है।

क्या छूटा?

आज हालात 2011 से बदतर हैं। तब भ्रष्टाचार अकेला मुद्दा था। अब उसके साथ पर्यावरण , जलवायु परिवर्तनऔर बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी हैं। उत्तराखंड चीख-चीखकर सबूत दे रहा है। जोशीमठ धंस रहा है, जंगल जल रहे हैं, नदियां बांधों में कैद हैं। पर जिनसे उम्मीद थी वो संगठन भी अपने में उलझकर रह गए हैं। कई नामचीन संगठन चाहे वह परमार्थ निकेतन हो गायत्री परिवार या कोई और सब इसी में फंसे हैं।

किसी को मंच चाहिए, किसी को मठ। किसी को पद चाहिए, किसी को प्रतिष्ठा। महानता की होड़ में उद्देश्य गुम है। धर्म सेवा से ज्यादा ब्रांड बन गया है। नतीजा: जनता के सवाल अनाथ हैं।

आगे क्या?

देहरादून बैठक का इम्तहान

उत्तराखंड में फिर ‘लोक आंदोलन’ का बिगुल बजा है। पर पहाड़ पूछ रहा है: क्या इसकी जड़ों में पानी है या ये भी कागज की नाव है? सच ये है कि जमीन से नाता टूट चुका है। गांव तक न कोई चेहरा पहुंचता है, न कोई एक्शन प्लान। पहाड़ का दर्द पहाड़ पर ही दम तोड़ देता है। सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड कराने से गंगा साफ नहीं होती। पोस्टर-प्रस्ताव से जोशीमठ नहीं बचता। 23 मई की बैठक का असली इम्तहान यही है: क्या टीम अन्ना के पास दिल्ली से देहरादून तक नहीं, देहरादून से दुर्गम गांव तक पहुंचने का रोडमैप है? वरना ये भी पुराने आंदोलनों की तरह फोटो खिंचवाकर खत्म हो जाएगा।

रामबाण कहाँ है?

समग्र चेतना अब सिर्फ सवाल नहीं पूछेगा, जवाब लेकर आया है। रिटायर्ड आईएएस डॉ. कमल टावरी के 50 साल के तजुर्बे से निकली ‘ब्लॉक अडॉप्शन नीति’। फौजी, कलेक्टर, संन्यासी — तीन जिंदगी जीने वाला शख्स सीधा फॉर्मूला दे रहा है:

एक ब्लॉक = एक मिशन।

न सरकार का इंतजार, न चंदे की कटोरी। हर ब्लॉक को एक टीम गोद ले – कथाकार, पत्रकार, फौजी, रिटायर्ड अफसर।

  • कथाकार: सोई हुई चेतना जगाए। कहानी से क्रांति।

  • पत्रकार: बंद फाइलों का ताला तोड़े। सवाल से समाधान।

  • फौजी: ‘नामुमकिन’ शब्द डिक्शनरी से हटाए। अनुशासन से निर्माण।

  • रिटायर्ड अफसर: सिस्टम की नस पकड़े। अनुभव से रास्ता।

मकसद एक: स्वरोजगार और स्वदेशी। गांव में ही ‘ग्राम ऊर्जा स्वराज’।

यही गांधी का ग्राम स्वराज है — 2026 का अपग्रेडेड वर्जन। अन्ना की दूसरी पारी की असली ताकत यहीं है।

23 मई क्या तारीख बन पाएगी?

टीम अन्ना की बैठक में अगर भाषण हुए, प्रस्ताव पास हुए और चाय-समोसे के साथ फोटो सेशन हुआ — तो समझो फिर चूक गए।

अगर बैठक से निकले 13 जिलों के 95 ब्लॉकों का नाम, हर ब्लॉक का एक ‘अन्ना’ और एक ‘टावरी’ — तो मानेंगे कि आंदोलन जिंदा है।

वरना जनता पूछेगी: अन्ना जी, रामलीला मैदान से देहरादून तक आए, पर पहाड़ के आखिरी गांव तक कब पहुंचोगे?

आखिरी बात:

भ्रष्टाचार मिटाना है तो पहले अहंकार मिटाओ। पर्यावरण बचाना है तो पहले ‘मैं’ बचाने की जिद छोड़ो। परमार्थ निकेतन को गंगा की चिंता है, गायत्री परिवार को यज्ञ की। पर गांव को रोटी की चिंता है। आंदोलन अब AC हॉल से नहीं, खेत की मेड़ से चलेगा। क्या देहरादून में ये तय होगा?

अन्ना 90 के हो चुके हैं। उनकी भी आयु सीमित है। ये नई पारी बेहद अहम है। पर ये तभी हिट होगी जब वो अन्ना के सिपाही मंच से उतरकर मिट्टी में उतरेगे। वरना इतिहास में एक और तारीख जुड़ जाएगी — 23 मई 2026 — ‘बैठक हुई थी’।

समग्र चेतना का सवाल: आंदोलन अब चेहरों से नहीं, चरित्र से चलेगा। क्या टीम अन्ना तैयार है?


प्रकाशक: समग्र चेतना

‘सोच समग्र, चेतना राष्ट्र की’

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