Advertisement

मुख्यमंत्री जी बढ़ा रहे, सूचना विभाग घटा रहा – चुनावी मौसम में सूखा, कोई तूफान का संकेत तो नहीं?

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महंगाई लगातार बढ़ रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसे समझते भी हैं, शायद यही वजह है कि वह लगातार “प्लस” के फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। शिक्षामित्र हों, अनुदेशक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिकाएं या संविदाकर्मी -लगभग हर वर्ग को किसी न किसी रूप में राहत देने की कोशिश दिखाई देती है। एक तरफ मुख्यमंत्री का संदेश साफ है – किसी को नाराज़ मत होने दो। दूसरी तरफ सूचना विभाग का हाल ऐसा दिख रहा है मानो हर फाइल पर पहले नमक छिड़का जा रहा हो और फिर कैंची चलाई जा रही हो। चर्चा चल रही है कि चुनावी मौसम में ऐसा सूखा कहीं कोई तूफान का संकेत तो नहीं है।

डॉ सुयश नारायण

Dr. Suyash Narayan Mishra

लखनऊ। चुनाव सिर पर हैं। यही वह मौसम होता है जब सरकारें नाराज़ आदमी को भी मुस्कुराने की वजह तलाशती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के सूचना भवन में इन दिनों अजीब-सा सूखा पसरा हुआ दिखाई देता है। पत्रकारों के बीच चर्चा है कि विज्ञापन घट रहे हैं, पत्रिकाओं के पन्ने सिकुड़ रहे हैं और उम्मीदें पतली होती जा रही हैं। सीएम योगी जहां जोड़ने में लगे हुए हैं, वहीं उनका विभाग मानो घटाने की नीति पर चल पड़ा है।

“एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि सूचना विभाग का बजट देखते ही शासन के एक अफसर वैसे घबरा जाते हैं जैसे घर का मुखिया स्मार्ट मीटर से आये बिजली का बिल देखकर घबराता है।” 

चुनावी माहौल में सकारात्मक वातावरण और मीडिया मैनेजमेंट की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब सूचना विभाग में आखिर ये क्या हो रहा है फाइलें पतली हो रही हैं, मैगज़ीनों के पन्ने सूख रहे हैं और पत्रकारों का ब्लड प्रेशर नार्मल नहीं है। चुनावी मौसम में उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग में इस समय अजीब किस्म का अकाल पड़ा हुआ है। ऐसा क्यों हो रहा है कोई नहीं जानता लेकिन चर्चा सब कर रहे हैं इससे कहीं हवा बिगड़े न।

विशाल कटौती से नाराजगी चरम पर
एक वर्ष पूर्व जब नए सूचना निदेशक आए तो नाम के साथ उम्मीदें भी बड़ी थीं। लोगों को लगा था कि व्यवस्था और व्यापक होगी, संवाद बेहतर होगा और विज्ञापन नीति में भी राहत मिलेगी। लेकिन हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। लगातार कटौतियों ने पत्रकारों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहले विज्ञापन दरों में कमी आई, फिर पत्रिकाओं पर रोक लगी और अब पन्नों की संख्या तक घटाई जा रही है। इससे लघु और मध्यम समाचार पत्रिकाओं में बेचैनी और असंतोष दोनों बढ़ रहे हैं। चुनावी माहौल के बीच यह स्थिति कई सवाल खड़े कर रही है। चिंता इस बात की कम है कि छोटी असंतुष्टि मानकर इसको नजरअंदाज किया जा रहा है, चिंता इस बात की है कि कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर इससे सरकार की छवि पर असर पड़ जाये।  नीचे भी है…

शायद पहली बार ऐसा हुआ
उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण राज्य माना जाता है। यहां के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के कार्यों की चर्चा आज केवल देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में सुनाई दे रही है। उनके नेतृत्व शैली, कानून-व्यवस्था और सख्त प्रशासनिक फैसलों को व्यापक स्तर पर सराहा जा रहा है। एक स्वतंत्र पत्रकार सूचना विभाग की कार्यप्रणाली से हैरान हैं उन्होंने बताया कि हाल ही में पांच राज्यों के चुनाव परिणाम सामने आए, जिनमें West Bengal के चुनाव प्रचार में सीएम योगी ने ताबड़तोड़ 20 से अधिक रैलियां कर माहौल बना दिया। इस दौरान उनके चुनावी नारे खूब वायरल हुए। यूपी की तर्ज पर माफियाओं को “जहन्नुम भेजने” वाले उनके बयान और बुलडोजर मॉडल पूरे चुनाव में चर्चा का केंद्र बने रहे। कई रैलियों में समर्थक बुलडोजर पर सवार नजर आए। सीएम योगी की मेहनत और आक्रामक प्रचार का असर चुनावी परिणामों में भी दिखाई दिया, लेकिन इसके बावजूद प्रमुख अखबारों की लीड खबरों से स्वयं योगी आदित्यनाथ का चेहरा अपेक्षाकृत गायब दिखा। यूपी की राजनीति में ऐसा दृश्य पहले शायद ही कभी देखने को मिला हो। चर्चाएं तेज हैं लोग इसे विभागीय नाकामी बता रहे हैं। 

फिर शिशिर को याद कर रहे पत्रकार
पत्रकार बिरादरी इन दिनों फिर शिशिर जी को याद कर रही है। मुख्यमंत्री जहां रोजगार और योजनाओं के जरिए सकारात्मक संदेश देने में जुटे हैं, वहीं सूचना विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार असंतोष बढ़ता दिख रहा है। शिशिर जी के दौर में विभाग का माहौल अलग था-नाम शिशिर और स्वभाव भी उतना ही शीतल। उनकी मैनेजमेंट शैली ऐसी थी कि बड़े से बड़ा मीडिया विवाद भी बातचीत और संतुलन से शांत हो जाता था। नाराज़ होकर पहुंचने वाले पत्रकार भी संतुष्ट होकर लौटते थे। उस समय सूचना विभाग पत्रकारों के लिए भरोसे और उम्मीद का केंद्र माना जाता था-भले देरी हो, लेकिन सहयोग मिल जाता था।

एक युवा पत्रकार की माने तो सबसे दिलचस्प बात यह है कि सीएम योगी लगातार छोटे और मध्यम समाचार पत्रों को लोकतंत्र की ताकत बताते हैं, जबकि विभागीय व्यवस्था उन्हें खर्च का बोझ मानती दिख रही है। ऊपर का संदेश कुछ और है और नीचे की कार्यशैली कुछ और। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि विशाल जी भी अधिकारी अनुभवी हैं और बिगड़े संबंधों की तुरपाई और बुनाई भी अच्छे से जानते हैं, पूर्व में कई मामले में ऐसा देखा गया है। लेकिन पत्रकार बिरादरी का मानना है कि मंहगाई के दौर में इतना भी टाइट न हो कि असर आगामी चुनाव पर भी दिखने लगे। माहौल बनाने वालों को नाराज कर विभाग अखिर क्या करना चाहता है।