पश्चिम का चमकता मुखौटा और भीतरी अंधेरा

प्रो. पुष्पिता अवस्थी (नीदरलैंड)
डॉ. सुयश मिश्रा (भारत)
अंतरराष्ट्रीय डेस्क। पश्चिमी देशों की चकाचौंध, खुली हवा सी लगने वाली आजादी और भोग का अंतहीन बाजार एशियाई युवाओं की आंखों में यही सपना तैरता है। पर यह सपना एक सजा-धजा मुखौटा है। जिस संस्कृति को हम ‘आधुनिकता’ का तमगा देकर आकर्षित होते हैं, वही अपने ही लोगों के लिए घुटन, अकेलापन और असहनीय दुख की जड़ बन चुका है। जिसने यूरोपियन शहरों को करीब से देखा उसे असलियत का पता चलता है। अब नीदरलैंड को ही देख लीजिए। देश का दर्शन तीन शब्दों पर टिका है ‘सामेन लेवेन’ यानी साथ रहना, ‘सामेन वेर्केन’ यानी साथ काम करना और ‘जोर्ग’ यानी सेवा। सुनने में कितना सुंदर है पर धरातल पर ये तीनों शब्द आज खुद बैसाखी के सहारे खड़े हैं। राजनीति इतनी अस्थिर कि तीन साल में सरकार गिर जाती है। महंगाई ऐसी कि दो कमाने वाले भी घर नहीं चला पाते। और ‘सेवा’? अस्पताल की पंक्ति में खड़े-खड़े मर्ज नहीं, मरीज दम तोड़ देता है। दुनिया इसे ‘खुशहाल देशों की सूची’ में सबसे ऊपर रखती है। दुनिया कहती है नीदरलैंड सबसे सुखी देश है। वहीं यहां का प्रवासी नागरिक कहता है यह सुख नहीं, सुनियोजित धोखा है। नाम बड़े और दर्शन छोटे।
भारत से तुलना करें तो फर्क साफ दिखता है। हमारी संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ सिर्फ नारा नहीं, जीवन है। यहां बुढ़ापे पर दादा-दादी की सेवा की जाती है। उन्हें घर से निकाला नहीं जाता। वहीं नीदरलैंड में बुढ़ापा आते ही वृद्धाश्रम भेजना ‘व्यवस्था’ कहलाती है। हमारे यहां अतिथि ‘देव’ होता है, उसके लिए घर का सबसे अच्छा कमरा खुलता है। वहां घरों में अतिथि-कक्ष ही नहीं, मेहमान सीधा होटल जाता है। हमारे यहां मां की गोद से लेकर श्मशान तक परिवार साथ चलता है। वहां शयन-कक्ष पहली मंजिल पर बनाकर बुढ़ापे को ही घर से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। यूरोप का यह काला सच जिसे प्रवासी बताते नहीं।
नीदरलैंड में न परिवार ठीक से चल पा रहे हैं, न सरकार। गठबंधन की राजनीति ऐसी कि कोई भी सरकार तीन साल से ज्यादा नहीं टिकती। चुनाव होते हैं, सरकार बनने में ही सात से नौ महीने लग जाते हैं। यानी देश आधा साल बिना किसी नीति के चलता है। बुजुर्ग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। युवा घर नहीं खरीद पा रहे। किराया आसमान पर है। ‘साथ रहना’ सिर्फ चुनावी नारा बनकर रह गया है। ‘सामेन वेर्केन’ का मतलब था सब मिलकर देश बनाएं। पर हकीकत में खेती करने वाले, पशुपालक और आम कामगार सरकार की नीतियों से परेशान हैं। पर्यावरण के नाम पर खेत बंद कराए जा रहे हैं। महंगाई इतनी कि दो लोगों की कमाई से भी घर चलाना मुश्किल। कामगार कहते हैं, “हम साथ काम करना चाहते हैं, पर सरकार हमारे साथ नहीं है।
‘जोर्ग’ शब्द का अर्थ है सेवा, देखभाल। पर नीदरलैंड के अस्पताल और देखभाल गृहों में हालत खराब है। बुजुर्गों की देखभाल के लिए कर्मचारी नहीं मिल रहे। अस्पताल में पंक्ति छह-छह महीने की है। छोटी बीमारी के लिए भी साल भर इंतजार करना पड़ता है। एक नागरिक ने कहा, “क्या बताएं, बीमार पड़ो तो ठीक होने से पहले ही हिम्मत जवाब दे जाती है।
घर की बनावट ही वृद्धों को निकाल देती है
पश्चिमी देशों में घरों की रचना ऐसी है कि शयन-कक्ष पहली मंजिल पर होता है। देह अशक्त होते ही सीढ़ी चढ़ना कठिन हो जाता है। न नीचे अतिथि-कक्ष है, न वृद्ध माता-पिता के लिए जगह। बुढ़ापा आते ही वृद्धाश्रम जाना विवशता बन जाती है। अतिथि आए तो सीधे होटल भेज दिया जाता है, क्योंकि घर में ठहराने की जगह ही नहीं। मां-बाप के लिए भी वही रास्ता। कोई विकल्प नहीं।
चिकित्सा व्यवस्था: बीमारी से ज्यादा इंतजार मारता है
बुखार हुआ तो सीधे चिकित्सक के पास नहीं जा सकते। पहले ‘घरेलू चिकित्सक’ को फोन करो। उसका सहायक दस दिन बाद का समय देगा। जांच का समय लेने में फिर दस दिन। रिपोर्ट आने में दस दिन और। यानी दवा मिलने में एक महीना। विशेषज्ञ के पास भेजा तो दो महीने बाद का समय मिलेगा। वहां भी पहले परिचारिका देखेगी। उसे ठीक लगा तो एक महीने बाद चिकित्सक से भेंट। आपात सेवा को बुलाओ तो सात-आठ घंटे लगते हैं। अस्पताल पहुंचो तो बारह घंटे बाद कोई साधारण चिकित्सक आता है। हर मर्ज की दवा ‘पैरासिटामोल’। दिन भर में आठ गोलियां ले सकते हो यही इलाज है।
वृद्धाश्रम: मृत्यु रोज जीने की जगह
जिसे हमारी संस्कृति ‘वानप्रस्थ’ कहती है, पश्चिम में वह ‘वृद्ध-गृह’ है। पर दोनों में जमीन-आसमान का अंतर। वहां भेजने का काम चिकित्सक ही करते हैं। तर्क देते हैं — यहां आपकी देखभाल अच्छी होगी। पर सच यह है कि वृद्ध की मासिक आय फिर सरकार के नियंत्रण में चिकित्सा के नाम पर चली जाती है। उसी धन से उन लोगों का वेतन दिया जाता है जो बौद्धिक रूप से संपन्न नहीं हैं। वृद्धाश्रम में सेवा करने वाले पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं होते। वरिष्ठ कर्मचारी नए सेवक को वृद्धों पर ही अभ्यास कराकर सिखाता है। जैसे भारत में चिकित्सक अपने कनिष्ठ को रोगी पर सिखाते हैं।
परिवार क्यों चुप है
परिवार हस्तक्षेप नहीं करता। बल्कि सोचता है कि कब घर छोड़ें, कब दुनिया से जाएं। चिकित्सक चाहते हैं वृद्धाश्रम जाएं, ताकि आय सरकार के पास रहे। वृद्ध का अपना घर, रसोई की सुगंध, बच्चों की खिलखिलाहट, ‘दादा-दादी’ की गूंज — सब छूट जाता है। जिसे उसने ईश्वर की तरह रचा-बसाया, वही छोड़ना पड़ता है। अपनों से बिछड़कर वह मृत्यु उसी दिन हो जाती है जिस दिन वह अपना घर छोड़ता है। उसके बाद तो देह सिर्फ सांसों की सिसकियों में जीती है। मृत्यु रोज देखता है, महसूस करता है।
जीवन विरोधी व्यवस्था
पश्चिम में देह को तंदुरुस्त रखने के लिए ‘व्यायाम केंद्र’ जाना शौक नहीं, मजबूरी है। साइकिल चलाना पर्यावरण प्रेम नहीं, गाड़ी की महंगी पार्किंग से बचने का उपाय है। बुढ़ापे से डर इतना कि युवा अपने घर में वृद्धों की परछाई तक नहीं देखना चाहते। किसी उत्सव में उनकी उपस्थिति तक नहीं होने देते।
प्रवासी क्यों सच नहीं बताते
वर्षों से हमारी पीढ़ियां विदेशी शासन झेलने के बाद भी विदेश का मोह नहीं छोड़ पा रही। मां-बाप चाहते हैं दामाद विदेश में बसा हो। लड़के वाले विदेश में बसी बहू चाहते हैं। 1834 में मजदूर बनाकर ले जाते थे। आज कंप्यूटर, तकनीक, वित्त और शिक्षा के नाम पर नई तरह की गुलामी है। वैश्विक शक्तियां इसे ‘अवसर’ कहती हैं। पर जो पचास साल विदेश में बिता कर बुढ़ापे में देश लौटते हैं, वे भी सच नहीं बोलते। क्यों? क्योंकि देश में उनकी इज्जत ‘विदेशी नागरिक’ होने के कारण है। अगर विदेश की सच्चाई बता दी तो वह प्रतिष्ठा भी चली जाएगी। इस डर से वे चुप रहते हैं। वे उस ब्याही बेटी जैसे हैं जो ससुराल का गुणगान इसलिए करती है ताकि मायके में इज्जत बची रहे।
अब चुप रहने का समय नहीं
यूरोप का स्वर्ग देखने से पहले वहां का नर्क देखना जरूरी है — जो वृद्धाश्रम और अस्पतालों में बसता है। जिसके पीछे वहां के चिकित्सक, सरकार और बीमा कंपनियां हैं। जो हर महीने आपके खाते से पैसा काटती हैं, और खर्च बढ़ने पर अलग से बिल भेज देती हैं।हमारी संस्कृति परिवार को केंद्र में रखती है। वहां व्यक्ति को केंद्र में रखकर परिवार तोड़ा गया। परिणाम सामने है — अकेलापन, अवसाद, और घुट-घुट कर मरता बुढ़ापा।नई पीढ़ी को विदेश भेजने से पहले यह सच बताना होगा। आकर्षण के मुखौटे के पीछे का अंधेरा दिखाना होगा। तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ी को उस जीवन विरोधी व्यवस्था से बचा पाएंगे, जहां श्मशान जाए बिना देह की अंत्येष्टि नहीं होती, वैसे ही वृद्धाश्रम जाए बिना जीवन पूरा नहीं होता।




