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पद नहीं, चरित्र बोलता है: डॉ. कमल टावरी की अद्भुत यात्रा

डॉ सुयश नारायण
Dr. Suyash Narayan Mishra

लखनऊ। अधिकारी बनने के बाद आमतौर पर हमारे मन में एक छवि उभरती है ठाठ-बाट, चमचमाती गाड़ियाँ, सलीकेदार पोशाक, रुतबा और सत्ता का अहसास। लेकिन इतिहास गवाह है कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके लिए पद कभी लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि सेवा उनका स्वभाव रही। ऐसे ही विरले व्यक्तित्वों में एक नाम है “डॉ. कमल टावरी”। एक ऐसा नाम, जो न केवल प्रशासनिक सेवा में रहा, बल्कि सेना, साहित्य, समाजसेवा और अंततः सन्यास तक की यात्रा का साक्षी बना। यह कहानी सिर्फ एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी की नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की है, जिसमें सादगी सबसे बड़ा आभूषण और ईमानदारी सबसे ऊँचा ओहदा होती है। समग्र चेतना निरंतर ऐसे जमीनी अफसरों का परिचय आप लोगों से कराता रहता है जिन्होंने समाज को कुछ दिया है।

डॉ. कमल टावरी का जन्म 1 अगस्त 1946 को महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ। वर्धा, जो महात्मा गांधी की कर्मभूमि रही, शायद उसी मिट्टी का असर था कि उनके भीतर बचपन से ही सादगी, स्वावलंबन और राष्ट्रसेवा के संस्कार गहरे बैठे थे। बचपन से ही वे साधारण जीवन और असाधारण सोच के धनी थे। उनके जीवन की दिशा शुरू से ही अलग थी—जहाँ अधिकतर लोग सुविधा और स्थिरता की तलाश में रहते हैं, वहीं कमल टावरी चुनौती और कर्तव्य के रास्ते पर चल पड़े। उनके जीवन का पहला बड़ा अध्याय भारतीय सेना से शुरू होता है। उन्होंने सेना में एक अधिकारी के रूप में छह वर्षों तक सेवा दी और कर्नल के पद तक पहुँचे। यह दौर उनके व्यक्तित्व को अनुशासन, साहस और नेतृत्व से भर देने वाला था। सेना ने उन्हें सिखाया कि आदेश देना नहीं, बल्कि सबसे पहले स्वयं उदाहरण बनना ही सच्चा नेतृत्व है। शायद यही वजह रही कि आगे चलकर जब वे प्रशासन में आए, तो उनका अंदाज़ हमेशा ज़मीन से जुड़ा और मानवीय रहा।

1968 में डॉ. कमल टावरी ने यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा पास की और भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में चयनित हुए। उत्तर प्रदेश कैडर के इस अधिकारी ने 22 वर्षों तक प्रशासन के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे कई जिलों के जिलाधिकारी रहे, मंडलायुक्त बने और राज्य व केंद्र सरकार में सचिव जैसे शीर्ष पदों तक पहुँचे। ग्रामीण विकास, ग्रामोद्योग, पंचायती राज, खादी और उच्चस्तरीय लोक प्रशिक्षण जैसे विभागों में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।

प्रशासनिक गलियारों में कमल टावरी को एक अलग तरह के अधिकारी के रूप में जाना जाता था। कहा जाता है कि यदि सरकार किसी अधिकारी को सज़ा के तौर पर किसी पिछड़े या उपेक्षित विभाग में भेजना चाहती थी, तो कमल टावरी का नाम लिया जाता था। लेकिन यह ‘सज़ा’ अक्सर उस विभाग के लिए वरदान साबित होती थी। उनकी कार्यशैली ऐसी थी कि वे हर विभाग को न केवल सक्रिय करते थे, बल्कि उसे एक नई पहचान भी दिला देते थे। उनकी सादगी की चर्चा जितनी व्यापक है, उतनी ही प्रेरक भी।

खादी का कुर्ता, लुंगी और कंधे पर गमछा—यह उनका स्थायी पहनावा बन गया। एक बार ग्राम्य विकास सचिव रहते हुए लखनऊ के जवाहर भवन में उन्होंने संकल्प लिया कि अब वे जीवन भर केवल खादी ही पहनेंगे। यह कोई दिखावटी फैसला नहीं था, बल्कि स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और गांधीवादी मूल्यों के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कमल टावरी के जीवन में एक ऐसा प्रसंग भी आया, जिसने उनके आत्मसम्मान और न्यायप्रियता को उजागर किया।

वर्ष 1983 में वे आईपीएस अधिकारी एस.एम. नसीम के साथ एक संदिग्ध यूपी रोडवेज बस का पीछा कर रहे थे। करीब 15 किलोमीटर पीछा करने के बाद बस को रोका गया, लेकिन बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने दोनों अधिकारियों पर हमला कर दिया। यह केवल शारीरिक हमला नहीं था, बल्कि प्रशासनिक गरिमा पर भी चोट थी।

 

डॉ. कमल टावरी ने इस घटना को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने कानूनी रास्ता चुना और न्याय की लड़ाई शुरू की। मामला अदालत में गया, फाइलें गुम हुईं, वर्षों बीतते गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। लगभग 29 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 26 मार्च 2012 को इलाहाबाद हाईकोर्ट से फैसला आया और आरोपियों को तीन-तीन साल की सजा हुई। उनके लिए यह लड़ाई व्यक्तिगत बदले की नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की थी कि कानून से ऊपर कोई नहीं। डॉ. कमल टावरी का मानना था कि यदि एक जिलाधिकारी, जो पूरे जिले का प्रशासनिक मुखिया होता है, अपने साथ हुई अभद्रता पर चुप रहे, तो यह व्यवस्था के लिए खतरनाक उदाहरण होगा। इस फैसले ने न केवल उनके आत्मसम्मान को स्थापित किया, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक संदेश दिया कि न्याय के लिए धैर्य और दृढ़ता आवश्यक है।

शैक्षणिक दृष्टि से भी डॉ. कमल टावरी असाधारण हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और साथ ही एलएलबी की पढ़ाई भी की। उनका मानना था कि प्रशासन केवल फाइलों से नहीं चलता, बल्कि उसके पीछे गहरी समझ और बौद्धिक तैयारी भी होनी चाहिए। इसी बौद्धिक यात्रा का परिणाम रहा कि उन्होंने अब तक 40 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनकी किताबें प्रशासन, ग्रामीण विकास, आत्मनिर्भरता, जीवन-दर्शन और प्रेरणा जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। 2006 में आईएएस पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका जीवन ठहर नहीं गया। उन्होंने इसे एक नए अध्याय की शुरुआत माना। वे युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने लगे, गाँवों के विकास पर काम करने लगे और लोगों को तनावमुक्त जीवन जीने के उपाय बताने लगे। उनका मानना था कि असली सेवा रिटायरमेंट के बाद शुरू होती है, जब आपके पास अनुभव भी होता है और अपेक्षाएँ भी नहीं होतीं।

कमल टावरी की कहानी हमें यह सिखाती है कि ओहदा बड़ा नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का चरित्र बड़ा होता है। खादी का कुर्ता, लुंगी और गमछा पहनने वाला यह साधारण-सा दिखने वाला व्यक्ति असाधारण इसलिए है, क्योंकि उसने जीवन भर अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सेना का अनुशासन, प्रशासन की समझ, लेखक की संवेदना और सन्यासी की शांति—इन सबका संगम हैं डॉ. कमल टावरी। आज जब समाज में सफलता को केवल चमक-दमक से आँका जाता है, तब कमल टावरी जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि असली रुतबा सादगी में है, असली ताकत ईमानदारी में है और असली सेवा निस्वार्थ भाव में। उनका जीवन एक जीवंत उदाहरण है कि अगर नीयत साफ हो और उद्देश्य बड़ा, तो हर रास्ता अर्थपूर्ण बन जाता है। कुछ लोग जन्म से ही साधारण होते हैं, लेकिन उनके कर्म और दृष्टिकोण उन्हें असाधारण बना देते हैं। डॉ. कमल टावरी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। सेना में कर्नल, आईएएस अधिकारी, लेखक, समाजसेवी और अब सन्यासी—उनके जीवन के हर पड़ाव ने यह साबित किया कि पद, उपाधि और रुतबा असली पहचान नहीं बनाते; चरित्र, ईमानदारी और सेवा ही बनाती है। आज वे स्वामी कमलानंद महाराज बन चुके हैं, लेकिन उनकी प्रेरक यात्रा लोगों के लिए हमेशा सीख और प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

कमल टावरी से बने स्वामी कमलानंद
साल 2022 में डॉ. कमल टावरी ने बद्रीनाथ में सन्यास ग्रहण किया और अपने सांसारिक नाम को त्यागकर स्वामी कमलानंद गिरि के नाम से जाने जाने लगे। यह परिवर्तन उनके लिए केवल एक रस्म नहीं था, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अगली अवस्था और आत्मान्वेषण का प्रतीक था। वर्षों तक प्रशासनिक जिम्मेदारियों और समाज सेवा में लगे रहने के बाद उन्होंने अपनी ऊर्जा और अनुभव को आध्यात्मिक मार्ग पर लगाने का निर्णय लिया। उनकी यह यात्रा न केवल पद और प्रतिष्ठा से परे एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, बल्कि यह दिखाती है कि जीवन में असली संतोष और संतुलन तब मिलता है जब व्यक्ति अपने कर्म और विचारों के माध्यम से समाज के लिए उपयोगी बनता है। अब वे समय का अधिकांश हिस्सा युवाओं के साथ बिताते हैं, उन्हें स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता और नैतिक नेतृत्व के महत्व के बारे में मार्गदर्शन देते हैं।

स्वामी कमलानंद युवाओं को यह सिखाते हैं कि सफलता केवल पद, पैसा या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि समाज के लिए सार्थक योगदान देने में निहित है। इसके अलावा वे गांवों और ग्रामीण इलाकों के विकास, शिक्षा और सामाजिक उत्थान के लिए प्रेरक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। उनका मानना है कि जब व्यक्ति अपने ज्ञान और अनुभव का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करता है, तभी असली संतोष और सफलता मिलती है। कमल टावरी से स्वामी कमलानंद बनने की यह यात्रा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में स्थायी महत्व केवल बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आंतरिक शांति, सेवा और नैतिकता में होता है।

पंचगव्य विद्यापीठम में नेतृत्व और ग्रामीण विकास की नई पहल

स्वामी कमलानंद, वर्तमान में कांचीपुरम, चेन्नई में स्थित पंचगव्य विद्यापीठम के कुलपति के रूप में अपने ज्ञान और अनुभव का योगदान दे रहे हैं। अपने प्रशासनिक और सामाजिक अनुभवों को आधार बनाकर वे शिक्षा और सामाजिक उत्थान के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विशेष रूप से ग्रामीण विकास और गांवों के सशक्तिकरण के लिए वे एक नई दिशा में काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि समाज के विकास के लिए सरकार की मदद पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय, प्रभावकारी, स्वाभिमानी, स्वावलंबी और स्वतंत्र अभियान ही सच्चे बदलाव की कुंजी हैं। स्वामी कमलानंद ने इस सिद्धांत को अपने कार्यक्रमों और पहलों में लागू किया है, जिससे गांवों के लोगों में आत्मनिर्भरता, जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना जागृत होती है। उनके प्रयासों का उद्देश्य केवल भौतिक विकास नहीं है, बल्कि मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उन्नति को भी सुनिश्चित करना है। उनकी पहलें शिक्षा, कृषि, और स्वरोजगार के क्षेत्रों में प्रभाव डाल रही हैं। युवा पीढ़ी के लिए वे प्रेरक हैं, उन्हें जीवन में स्वावलंबी बनने और समाज के लिए योगदान देने का रास्ता दिखाते हैं। स्वामी कमलानंद का दृष्टिकोण यह सिखाता है कि सच्चा विकास तभी संभव है जब लोग अपनी शक्ति और संसाधनों का उपयोग स्वाभिमान और स्वतंत्रता के साथ करें, और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए खुद सक्रिय हों।

(दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक मैग्जीन समग्र चेतना में जनवरी 2026 के अंक में प्रकाशित)

 

 

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