उत्तर प्रदेशलखनऊसमग्र समाचार

सूचना निदेशक की पहल, पहचान अब व्याख्या की मोहताज नहीं

डॉ सुयश नारायण
Dr. Suyash Narayan Mishra

लखनऊ। डिजिटल युग में जब हर क्षेत्र तकनीक के सहारे खुद को अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बना रहा है, ऐसे में पत्रकारों के लिए बार-कोड युक्त मान्यता कार्ड एक दूरदर्शी और ठोस पहल से कम नहीं है। वर्तमान सूचना निदेशक आईएएस विशाल सिंह की यह व्यवस्था न सिर्फ पहचान की प्रक्रिया को सरल और विश्वसनीय बनाएगी बल्कि बार-बार पहचान के लिए व्याख्या नहीं करनी पड़ेगी। सूचना निदेशक ने समस्याओं का तकनीक के माध्यम से बड़ा और स्थायी समाधान निकाला है।

कार्ड जेब में हो, नाम सरकारी सूची में दर्ज हो और फिर भी अपनी पहचान साबित करनी पड़े तो यह किसी विडंबना से कम नहीं। यह घटना 2020–21 के आसपास की है, जब अचानक मुझे दिल्ली जाना पड़ा। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की एसी बसों में मान्यता प्राप्त पत्रकारों को किराये से मुक्त यात्रा की सुविधा है। यह सुविधा पत्रकारों को इसलिए दी जाती है ताकि वे निर्भीक होकर, बिना किसी अतिरिक्त बोझ के अपना पेशेवर दायित्व निभा सकें। मैं जनरथ बस में सवार हुआ। कंडक्टर को अपना मान्यता प्राप्त पत्रकार पहचान पत्र दिखाया।

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कंडक्टर ने कार्ड को गौर से देखा और तुरंत यह कहकर नकार दिया कि इस पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं। मैंने शांत स्वर में समझाने की कोशिश की कि मैं राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकार हूँ और हमारे कार्ड पर जिलाधिकारी नहीं, बल्कि सूचना निदेशक के हस्ताक्षर होते हैं। लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था।

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संयोग से उसी बस में सहारा के एक पत्रकार साथी भी यात्रा कर रहे थे। उनकी मान्यता जिला स्तर की थी और उनके कार्ड पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर थे। कंडक्टर ने बिना किसी सवाल के उनका कार्ड स्वीकार कर लिया। सहारा के हमारे पत्रकार साथी ने तत्कालीन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो सकी। बस चल पड़ी, बहस खत्म हुई और अंततः मुझे टिकट लेना पड़ा। बाद में इस पूरे घटनाक्रम की औपचारिक शिकायत की गई। वीडियो स्टोरी के जरिए इस समस्या को सार्वजनिक मंच पर रखा गया, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी प्रणाली की है।

दरअसल, कहीं हस्ताक्षर पर सवाल, कहीं कार्ड के प्रारूप पर, तो कहीं यह शंका कि कार्ड असली है या नहीं। ऐसी ही परिस्थितियों के बीच अब एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत हुई है। वर्तमान सूचना निदेशक विशाल सिंह द्वारा बार-कोड से सुसज्जित मान्यता कार्ड जारी किए जाने का निर्णय इसी लंबे समय से चली आ रही समस्या का व्यावहारिक समाधान माना जा सकता है। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि पत्रकारों की पहचान और विश्वसनीयता को कोई भी आसानी से जान सकता है।

कार्डों में यूनिक बार-कोड
मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को दिए गए इन नए कार्डों में यूनिक बार-कोड लगाया गया है। इस बार-कोड को कोई भी व्यक्ति—चाहे वह बस कंडक्टर हो, सुरक्षाकर्मी हो या कोई प्रशासनिक अधिकारी—अपने मोबाइल से स्कैन कर सकता है। स्कैन करते ही व्यक्ति सीधे सूचना विभाग के आधिकारिक वेब पेज पर पहुँच जाता है, जहाँ संबंधित पत्रकार की पूरी जानकारी उपलब्ध होती है। नाम, फोटो, मान्यता की स्थिति—सब कुछ एक क्लिक पर सामने होता है। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पहचान अब व्याख्या की मोहताज नहीं रहेगी। न किसी को यह समझाना पड़ेगा कि कार्ड पर किस अधिकारी के हस्ताक्षर क्यों हैं और किसके क्यों नहीं। इससे न सिर्फ पत्रकारों को सुविधा होगी ​बल्कि डुप्लीकेसी की संभावनाओं पर विराम लगेगा और व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी।

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